मंगलवार, 17 सितंबर 2024

उपन्यास अंश: तमस (लेखक: भीष्म साहनी)

    

तमस

भीष्म साहनी 


उपन्यास से एक अंश...

मूसा छोटा था और मूसा खुद पैगम्बर बनना चाहता था। अभी वह पैगम्बर बना नहीं था। मगर चाहता बहुत था। खिजर तो पहले ही पैगम्बर था। समझे? और उम्र में भी बड़ा था, सब लोग उसकी बड़ी इज्जत करते थे? करीमखान कहे जा रहा था। उसकी छोटी-छोटी आँखें सारा वक्त मुसकराती रहतीं और जब हँसता तो अपने जानूँ पर चपत मारता, जिस पर आस-पास बैठे सभी लोग मुसकराने लगते।

तो एक दिन मूसा ने खिजर से कहा कि तुम मुझे अपना शागिर्द बना लो। खिजर ने कहा, "अच्छी बात है, बना लेंगे, मगर एक शर्त पर।" 'वह क्या?' मूसा ने पूछा। "शर्त यह कि तुम बोलोगे नहीं, मैं कुछ भी करूँ, तुम अपना मुँह बन्द रखोगे।" मूसा ने कहा मंजूर है तो खिज़र ने उसे अपना शागिर्द बना लिया।

अब खिजर उसे सिखाना चाहता था। क्या सिखाना चाहता था? कि देखता तो खुदावन्द ताला है, हम इन्सान तो कुछ भी नहीं देख सकते, हम तो अपने दिमाग घिसा-घिसाकर सबब और बायस खोजते रहते हैं, मगर हमारे हाथ कुछ भी नहीं लगता क्योंकि देखता तो खुदावन्द करीम है। तो खिजर ने कहा कि तुम बोलोगे नहीं, मैं कुछ भी करूँ, कुछ भी बोलूँ, तुम अपना मुँह बन्द रखोगे।

हुक्का करीमखान ने आगे सरका दिया था, अब उस पर जिलानी फूंके मार रहा था। ढलती दोपहर में भिश्ती दूकान के सामने छिड़काव कर गया था और मिट्टी की सोंधी-सोंधी गन्ध हवा में फैली थी। सड़क पर आमदरफ्त कम हो गयी थी। कुछ लोग जामा मस्जिद में दिन की नमाज पढ़ने जाते एक- एक करके सामने से गुजरते नजर आते।

तो क्या हुआ, दूसरे रोज खिजर एक गाँव से दूसरे गाँव की तरफ जाने लगता। मूसा भी पीछे-पीछे। बाद में मूसा बहुत बड़ा पैगम्बर बना, पर उस वक्त वह खिजर का चेला था । सुन जिलानी, कान खोल के सुन बड़ा सबक आमोज किस्सा है। - तो दोनों चल पड़े। अब रास्ते में नदी पड़ती थी, और किनारे पर एक किश्ती बंधी थी जिसमें लोग नदी पार करते थे। अब क्या हुआ कि दोनों नीचे उतरे और किश्ती में बैठ गये और पत्तनवाला उन्हें पार ले जाने लगा। तो थोडी देर में मुमा ने क्या देखा कि खिजर किश्ती के तले मैं छेद कर रहा है। किश्ती बिलकुल नयी थी जैसे आज ही बनकर आये ताने मैंऔर खिजर उसने पेदे में छेद किये जा रहा है। एक छेद कर चुकने के बाद उसने एक और छेद कर दिया, फिर एक और। मूसा चिल्लाया, "बरबाद आप क्या कर रहे हैं, किश्ती डूब जायेगी! हम दोनों डूब जायेंगे।"  

खिजर ने उँगली अपने होंठों पर रखकर उसे चुप रहने का इशारा किया। पर मुसा परेशान हो उठा था क्योंकि नाव में पानी भरने लगा था और बह डर रहा था कि नाव अत्र डूबी कि अब डूवी। पर वह चुप हो गया, खिजर को जवान जो दे चुका था । थोड़ी देर बाद खिजर ने एक-एक करके छेद बन्द कर दिये लेकिन तब तक नाव का तला बहुत कुछ खराब हो चुका था। अब दोनों पार हुए-पार हुए तो अल्लाह रहम करे - दोनों जा रहे थे जब एक जगह एक छोटा-सा लड़का जमीन पर बैठा खेल रहा था। बच्चे के पास से गुजरे तो खिजर ने आव देखा न ताव, बच्चे को उठाकर उनकी गर्दन मरोड़ दी।

"यह क्या? यह क्या?" मूसा चिल्लाया, "मासूम बच्चे को मार डाला!!" पर खिजर चुप। खिजर ने फिर उँगली होंठों पर रख दी और मूसा को चुप रहने का हुक्म किया।

"'अलह्मदुलिल्लाह! बोलूं नहीं? आपने बेगुनाह बच्चे की गर्दन मरोड़ दी। न जान न पहचान, इस गाँव में आपने पहले कभी कदम नहीं रखा। इस मासूम से भला आपकी क्या अदावत थी?" मूसा बहुत परेशान हुआ। अन्दर से तो वह भी पैगम्बर ही था न, अभी उसे पैगम्बरी मिली नहीं थी। करीम खान ने सिर हिलाकर कहा - अब खुदा रहम करे, दोनों आगे जाने लगे। गाँव पार किया। अब जो गाँव की हदबन्दी पर पहुँचे तो वहाँ पर टूटी-फूटी दीवार थी। मूसा तो एक छलाँग से उसे पार कर गया, मगर पीछे मुड़कर देखा खिज़र दीवार के पास खड़े हैं और आस-पास गिरी टूटी ईटों को उठा- उठाकर दीवार पर रख रहे हैं, दीवार की चुनायी कर रहे हैं। मूसा लौट आया, "बुजुर्गवारम ! उस बच्चे को तो आपने मौत के घाट उतार दिया जिसने जिन्दगी के दो दिन भी नहीं देखे और इस दीवार को जो वर्षों से टूटी पड़ी है, फिर से खड़ा कर रहे हैं। यह क्या माजरा है। आपकी बातें मेरी समझ में नहीं आतीं।" खिजर ने फिर उंगली उठाकर उसे चुप रहने का इशारा किया। मुसा फिर चुप हो गया।

वे फिर आगे बढ़े। चलते गये, चलते गये। एक बाग में पहुंचे जहाँ चश्मा बह रहा था और ऊपर छायादार पेड़ था। दोनों ने मुंह-हाथ धोया और वा के नीचे बैठ गये। अब खिज़र बोला, "सुन बरखुरदार, वह जहाँ मैंने किश्ती में छेद किया था, और तू बिगड़ने लगा था, दरअसल उस गाँव का हाकिम बड़ा जालिम है, वह अपनी ऐश-ओ-इशरत के लिए गरीब लोगों की किश्तियाँ छीन लेता है। मैंने सोचा उस नाब में छेद कर दूँ तो हाकिम के आदमी इसे उठायेंगे नहीं, उसे वहीं छोड़ जायेंगे और पत्तनवाले का रोजगार बना रहेगा।" मूसा चुपचाप सुनता रहा। "पर आपने उस बेगुनाह बच्चे को क्यों मारा?" "सुनो, सुनो, अभी बताता हूँ। वह बच्चा हराम का बच्चा था, हलाल का बच्चा नहीं था। जिस आदमी की बह औलाद है वह बड़ा जालिम है, जालिम और नापाक। मैंने उस बच्चे को इस- लिए कत्ल कर दिया कि वह भी बड़ा होकर जालिम बनता और बेगुनाह लोगों पर जुल्म ढाता। अब कहो, मैंने अच्छा किया या बुरा किया?"

मूसा सोच में पड़ गया, उसका सिर झुक गया। "मगर आपने उस टूटी-फूटी दीवार की मरम्मत क्यों की? इससे किसी को क्या फायदा?" "वह भी सुनो" खिज़र बोला, "यह जिस टूटी-फूटी दीवार की मैंने मरम्मत की है, उसके नीचे खजाना गड़ा है। बहुत बड़ा खजाना। मगर गाँववालों को इसकी कुछ भी खबर नहीं है। और गाँववाले बहुत गरीब हैं, और बहुत जरूरतमन्द हैं। मैं उनकी मदद करना चाहता हूँ। मैंने दीवार को पक्का कर दिया है। जब वे लोग अपने हल चलाते हुए यहाँ तक पहुँचेंगे तो यह दीवार उनके रास्ते में रुकावट साबित होगी और वे एक दिन उसे तोड़ देंगे, और एक-एक ईंट उठाकर खेतों के बाहर फेंकेंगे, और उन्हें नीचे से गड़ा हुआ खजाना मिल जायेगा और वे मालामाल हो जायेंगे । इनके तन पर कपड़ा होगा और घर में रोटी होगी। अब बता मैंने क्या बुरा किया?"

करीमखान ने किस्सा कह चुकने के बाद सिर हिलाते हुए एक-एक साथी की ओर देखा, फिर बोला, "तो कहने का मतलब कि जो बात हाकिम देख सकता है वह आम लोग, तुम और हम नहीं देख सकते। अंग्रेज हाकिम की आँख चारों तरफ देखती है वरना क्या यह मुमकिन है कि मुट्ठी-भर फिरंगी सात समन्दर पार में आकर इतने बड़े मुल्क पर हुकूमत करें? अंग्रेज बहुत दानिशमन्द हैं, दूरअन्देश हैं"...

"बेशक! बेशक!" आस-पास बैठे लोगों ने सिर हिलाये।

बुधवार, 11 सितंबर 2024

कहानी: बैताल की छब्बीसवीं कथा (लेखक: हरिशंकर परसाई)

     

बैताल की छब्बीसवीं कथा

हरिशंकर परसाई

    
बै
ताल ने विक्रम से कहा-हे विक्रम, मैं तुझसे बहुत प्रसन्न हूं, इसलिए तुझे एक कथा और सुनाता हूं। सुन -                                          एक समय की बात है। एक नगर में शिवदत्त नामक एक वेदपाठी धार्मिक ब्राह्मण रहता था। उसके घर एक पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम देवदत्त रखा गया। देवदत्त बड़ा सुंदर लड़का था। वह चंद्रमा की कला की भांति बढ़ने लगा। जब उसके दूध के दांत आए तो उसके माता-पिता ने देखा कि लड़के के सामने के दो दांत बहुत बड़े हैं। एक दिन शिवदत्त ब्राह्मणी से कह रहा था, 'कोई चिंता की बात नहीं। ये तो दूध के दांत हैं। इनके टूटने पर सुडौल दांत आ जाएंगे।' बालक देवदत्त यह सुनकर बड़े जोर से रोने लगा और 'ऊं हूं! ऊं हूं!' चिल्लाने लगा। माता-पिता को बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह अबोध बालक उनकी बात कैसे समझा और क्यों रोया। जब कभी दांतों की बात निकलती और उन बड़े बेडौल दांतों की बुराई होती, देवदत्त चीखने-चिल्लाने लगता।

    देवदत्त बड़ा हुआ। उसके दूध के दांत टूटे और नए दांत आए। पर माता-पिता की आशा व्यर्थ गई। नए दांत पहले से भी बड़े और बाहर निकले हुए थे। एक दिन उसकी मां अपने पति से कह रही थी, 'लड़के का मुंह तो सुडौल है, पर इन दांतों ने उसका चेहरा बिगाड़ दिया है।' शिवदत्त ने कहा, 'हम डॉक्टर से इसके ये दांत निकलवाकर नए छोटे दांत लगवा देंगे।' देवदत्त ने, जो वहीं खेल रहा था, यह बात सुन ली। वह कहने लगा, 'मैं ये दांत नहीं निकलवाऊंगा।' शिवदत्त ने उसे समझाया तो वह रोने लगा और बोला, 'नहीं, चाहे कुछ हो, मैं ये दांत नहीं निकलवाऊंगा।' माता-पिता ने यह सोचकर धीरज रखा कि यह अभी नादान है, बड़ा होने पर हठ नहीं करेगा।

    हे विक्रम, देवदत्त पाठशाला जाने लगा। वहां उसके सहपाठी उसे चिढ़ाते थे। कोई कहता, 'इसने घर के खपड़े लगा रखे हैं।' कोई कहता, 'ये हल के फल हैं, जिनसे आगे चलकर यह खेती करेगा।' कोई कहता, 'भगवान् का वाराह अवतार हुआ है।' पर देवदत्त पर कोई प्रभाव न पड़ता। वह हंसता ही रहता। वह जब कॉलेज में पहुंचा तो उसके सहपाठियों ने उसे 'डेंटिस्ट' नाम दे दिया। इस नाम से भी देवदत्त बिलकुल नहीं चिढ़ता। वह संत-जैसा शांत रहता, हंसता रहता।

    उसकी पढ़ाई समाप्त हुई। अब शिवदत्त अपने पुत्र के विवाह की चिंता करने लगा। कई जगह विवाह की बात आई-गई, पर संबंध कहीं भी तय नहीं हो सका। लड़की वाले आते और देवदत्त के दांत देखकर लौट जाते। तब एक दिन शिवदत्त उसे पुनः समझाने लगा, 'बेटा, हठ छोड़ दे। इन दांतों को निकलवाकर दूसरे दांत लगवा। किसी अच्छे घर में विवाह हो जाएगा।' यह सुनकर देवदत्त बोला, 'पिता जी, चाहे मैं क्वांरा रह जाऊं, पर इन दांतों को नहीं निकलवाऊंगा। ये मुझे प्राणों से भी अधिक प्यारे हैं।' शिवदत्त बेटे की हठ के सामने हार गया। उसने एक दरिद्र घर में साधारण लड़की से उसकी शादी कर दी।

    हे राजन्, अब देवदत्त नौकरी करने लगा। वह अपने दांतों को शोभा की तरह गर्व से धारण करता। उसने दोनों दांतों में सोने की एक-एक कील ठुकवा ली जिससे वह दमकने लगे।

    देवदत्त का एक मित्र था, जिसका नाम विष्णुदत्त था। विष्णुदत्त ने एक दिन उससे कहा, 'बंधु, इन बेडौल दांतों से तुम्हारा इतना मोह क्यों है? वे तुम्हारे सुंदर मुख को विकृत कर देते हैं, फिर भी तुम इन्हें क्यों इतना चाहते हो?' देवदत्त ने कहा, 'बंधु, तुम नहीं जानते, कोई नहीं जानता कि इन दांतों का मेरे लिए क्या मूल्य है। ये अत्यंत पवित्र दांत हैं, मेरे पूर्व जन्म के पुण्य के फल हैं। ये मुझे वरदान में मिले हैं। मुझे वह दृश्य अब तक याद है, धर्मराज ने अपने सहायकों को मुझे बड़े दांत देने का आदेश दिया था।'

    यह सुनकर विष्णुदत्त बड़े आश्चर्य में पड़ा। उसने कहा, 'बंधु, क्या तुम्हें पूर्व जन्म का वृत्तांत मालूम है? मुझे बतलाओ कि तुमने उस जन्म में कौन से पुण्य किए थे, जिनके फलस्वरूप तुम्हें ये दांत मिले।'

    हे विक्रम, मित्र की जिज्ञासा देख और उसे अधिकारी समझकर देवदत्त ने कहा-बंधु, मैं तुझे अपने पूर्व-जन्म का वृत्तांत सुनाता हूं, जो मैंने किसी को नहीं सुनाया। ध्यान देकर सुन -

    पिछले जन्म में मैं एक प्राइवेट कॉलेज में लेक्चरर था। उस संस्था का प्रबंध करने के लिए एक समिति थी जिसके अध्यक्ष बाबू मिठाईलाल थे, जिनकी चौक में मिठाई की बड़ी दुकान थी। बंधु, बाबू मिठाईलाल ही हमारे कॉलेज के कर्ता-धर्ता थे, उन्हीं की इच्छा से नियुक्ति होती थी और उन्हीं की अप्रसन्नता से नौकरी समाप्त होती थी। हम सब लेक्चरर-प्रोफेसर लोग बाबू मिठाईलाल की दुकान पर रोज जाते थे। प्रातःकाल जब हमें पढ़ाने के लिए अध्ययन करना चाहिए, हम बाबू जी की दुकान पर बैठकर उनकी प्रशंसा करते या उनके बच्चों को खिलाते थे। बंधु, मैंने जलेबी बनाना सीख लिया था और कई बार उनकी दुकान पर जब मेरे साथी न होते, मैंने जलेबी भी बनाई थी। इससे बाबू जी बहुत प्रसन्न हुए थे।

    बंधु, एक बार उस कॉलेज में, असिस्टेंट प्रोफेसर की एक जगह खाली हुई। यह ऊंचा पद था और वेतन भी डेवढ़ा था। मुझसे दो सीनियर लेक्चरर थे। मेरा नंबर तीसरा था। इसलिए, सबको विश्वास था कि वह पद उन दो में से किसी को मिलेगा। पर मैं निराश नहीं हुआ। मैंने भी प्रयत्न किए। मैं बाबू मिठाईलाल की दुकान पर अधिक बैठने लगा। मैंने बड़ी लगन से इमरती बनाना भी सीख लिया और जब एक दिन मैंने इमरती बनाकर दिखाई तब तो बाबू जी बहुत प्रसन्न हुए। कहने लगे, 'वाह, मुझे नहीं मालूम था कि इतिहास का प्रोफेसर इतनी अच्छी इमरती बना सकता है।' मैंने कहा, 'बाबू जी, सब आपकी कृपा है।'

    बंधु विष्णुदत्त, मेरे वे दोनों प्रतिद्वंद्वी भी बाबू जी के पास अब अधिक बैठने लगे थे। मुझे मालूम हो गया था कि वे चुपके-चुपके जलेबी बनाना सीख रहे हैं। पर तब तक मैं इमरती बनाना सीख चुका था और वे पिछड़ गए थे।

    एक दिन जब मैं बाबू जी की दुकान पर पहुंचा तो वे उदास दिखे। मैंने कहा, 'बाबू जी, आप आज कुछ उदास दिख रहे हैं। सब कुशल तो है न?' वे दार्शनिक की तरह बोले, 'अरे भाई, दुनिया में सुख-दुःख तो लगे ही हैं। जब तक देह है तब तक दुःख है।' मैंने कहा, 'फिर भी यदि आपत्ति न हो तो अपनी चिंता का कारण मुझे बताइए। शायद मैं कुछ कर सकूं।' बाबू जी कहने लगे, 'बात यह है कि अपना नया मकान जहां बन रहा है, वहां एक आदमी ने कई साल पहले आत्महत्या की थी। उसका प्रेत वहां रहता है। पंडित जी ने बताया है कि वह मकान में रहने वालों को परेशान करेगा।' मैंने कहा, 'प्रेत की शांति का उपाय भी तो होता है।' वे बोले, 'हां, वही बता रहा हूं। पंडित जी ने कहा है कि विधिपूर्वक शुभ मुहूर्त में पूजा करके आदमी का एक दांत नींव में गाड़ देने से प्रेत शांत हो जाएगा। चिंता का विषय यह है कि दांत कैसे मिले।' यह सुनकर मैंने कहा, 'इसमें क्या कठिनाई है? कितने ही लोगों के दांत गिरते रहते हैं। में ही एकाध ला दूंगा।' बाबू जी हंसे। कहने हो, तो तुम समझे नहीं। अपने आप उखड़ा हुआ दांत नहीं चलेगा। इस कार्य क्षणे, लए ताजा उखाड़ा हुआ दांत चाहिए।' बंधु, मैं विचार में पड़ गया। मैंने कोचा कि स्वामी पर संकट आया है। मुझे इनके हित के लिए त्याग करना चाहिए। मैंने कहा, 'बाबू जी, मेरा एक दांत जरा हिलता है। अगर आप कहें तो...' बाबू जी बीच में ही बोल पड़े, 'अरे तुम जवान आदमी हो। तुम्हारा दांत क्यों हिलेगा?' मैंने कहा, 'नहीं बाबू जी, मैं सच कहता हूं। एक थोड़ा-थोड़ा हिलता है। मैं इसे उखड़वाकर आपको दे दूंगा।' बाबू जी संतुष्ट हुए। फिर भी संकोच से बोले, 'सोच लो। तुम्हारा सुडौल चेहरा थोड़ा बिगड़ जाएगा।' मैंने कहा, 'बाबू जी, क्या मैं और क्या मेरा चेहरा ? आपके लिए तो मैं पूरी बत्तीसी उखड़वा दूं।' बाबू जी बोले, 'तो ठीक है। कल दोपहर बारह बजे का मुहूर्त है। तुम सुबह डेंटिस्ट वर्मा के यहां चले जाना। वे उखाड़ देंगे।'

    बंधु, रात्रि को मैंने पत्नी से कहा, 'प्रिये, मेरी तरक्की असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हो जाएगी।' उसने कहा, 'लेकिन तुमसे दो आदमी सीनियर हैं।' मैंने उसे बाबू जी से हुई बात बतलाई। सुनकर वह बहुत बिगड़ी। कहने लगी, 'हमें नहीं चाहिए, ऐसी तरक्की। हम भूखे रह लेंगे, पर ऐसी नौकरी नहीं करेंगे, जहां दांत देना पड़े।' मैंने समझाया, 'मूर्खे, दांत देने में कोई हरज नहीं। लोग तो नाक और कान देकर तरक्की पा रहे हैं। नाक एक होती है और कान दो, पर दांत तो बत्तीस होते हैं। एक चला गया तो क्या हुआ?' स्त्री ने हठ पकड़ ली। बोली, 'नहीं, मैं तुम्हारा दांत नहीं जाने दूंगी। तुम्हारा ऐसा सुंदर चेहरा बिगड़ जाएगा। तुम साफ कह दो कि मुझे दांत नहीं देना।'

    बंधु, स्त्री के हठ के सामने बड़े-बड़े वीर नहीं टिक सके। मैं तो साधारण आदमी था। प्रातःकाल मैं बाबू जी के पास पहुंचा और बड़ी कातरता से बोला, 'बाबू जी, एक धर्मसंकट आ गया है। घर में पत्नी को एतराज है।' यह सुनकर बाबू जी जोर से हंसे। कहने लगे, 'अरे तुम-जैसा आदमी भी औरत के बहलावे में आ गया। औरत में अकल भी होती है, जाओ, सीधे डॉक्टर वर्मा के पास चले जाओ। घर मत जाना।'

    मेरा मन फिर मजबूत हो गया और मैं डॉक्टर वर्मा के पास गया। दांत उखड़वाया और कागज में लपेटकर बाबू जी को सौंप दिया।

    बंधु कहने की आवश्यकता नहीं कि मेरी नियुक्ति उस पद पर हो गई। मैंने शेष जीवन सुख से बिताया। समय आने पर देह त्यागकर उस लोक गया। वहां धर्मराज के सामने उपस्थित किया गया। मेरे पाप-पुण्य का लेखा-जोखा पेश किया गया। धर्मराज ने कहा, 'इस मनुष्य ने अपने स्वामी के लिए दांत दिया था, इसने एक दांत देकर अपनी उन्नति का रास्ता बनाया था। इसे इस पुण्य का फल मिलना चाहिए। इसे अगले जन्म में बड़े दांत मिलने चाहिए। इसे हाथी या जंगली सुअर की योनि में पृथ्वी पर जन्म दिया जाए।' यह सुनकर सचिव ने कहा, 'महाराज, इसका पुण्य इस कोटि का नहीं है कि इसे हाथी या सुअर बनाया जाए।' तब कुछ सोचकर धर्मराज ने आदेश दिया, 'अच्छा, तो इसे मनुष्य ही बनाओ, पर एक के बदले दो बड़े-बड़े दांत का।'

    बंधु विष्णुदत्त, यही मेरे पिछले जन्म का वृत्तांत है। ये दांत वरदान के हैं और लोग कहते हैं कि इन्हें उखड़वा दो।

    कथा सुनाकर बैताल बोला, "हे विक्रम, यह कथा देवदत्त ने विष्णुदत्त को सुनाई। तूने भी सुनी। अब तू बता कि कथा सुनकर विष्णुदत्त हंसा होगा या रोया होगा?"

    विक्रम ने एकदम कहा, "रोया होगा।"

यह सुनते ही बैताल उड़ा और जाकर उसी वृक्ष पर फिर लटक गया।


कविता: यह मन्दिर का दीप (लेखक: महादेवी वर्मा)

         यह मन्दिर का दीप महादेवी वर्मा        यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो  रजत शंख घड़ियाल स्वर्ण वंशी-वीणा-स्वर, गये आरती वेला को शत...