शुक्रवार, 21 जून 2024

कविता: नक्सलबाड़ी (लेखक: धूमिल)

   

नक्सलबाड़ी 

सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'

‘सहमति…
नहीं, यह समकालीन शब्द नहीं है
इसे बालिग़ों के बीच चालू मत करो’

- जंगल से जिरह करने के बाद

उसके साथियों ने उसे समझाया कि भूख
का इलाज नींद के पास है!

मगर इस बात से वह सहमत नहीं था
विरोध के लिए सही शब्द टटोलते हुए
उसने पाया कि वह अपनी ज़ुबान
सहुवाइन की जाँघ पर भूल आया है;
फिर भी हकलाते हुए उसने कहा -
‘मुझे अपनी कविताओं के लिए
दूसरे प्रजातन्त्र की तलाश है’,
सहसा तुम कहोगे और फिर एक दिन -
पेट के इशारे पर
प्रजातन्त्र से बाहर आकर
वाजिब ग़ुस्से के साथ अपने चेहरे से
कूदोगे
और अपने ही घूँसे पर
गिर पड़ोगे।

क्या मैंने ग़लत कहा? आख़िरकार
इस ख़ाली पेट के सिवा
तुम्हारे पास वह कौन-सी सुरक्षित
जगह है, जहाँ खड़े होकर
तुम अपने दाहिने हाथ की
साज़िश के ख़िलाफ़ लड़ोगे?

यह एक खुला हुआ सच है कि आदमी -
दाएँ हाथ की नैतिकता से
इस कदर मजबूर होता है
कि तमाम उम्र गुज़र जाती हैं मगर गाँड
सिर्फ़ बायाँ हाथ धोता है।

और अब तो हवा भी बुझ चुकी है
और सारे इश्तहार उतार लिए गए हैं
जिनमें कल आदमी -
अकाल था। वक़्त के
फालतू हिस्सों में
छोड़ी गयी पालतू कहानियाँ
देश-प्रेम के हिज्जे भूल चुकी हैं,
और वह सड़क -
समझौता बन गयी है
 
जिस पर खड़े होकर
कल तुमने संसद को
बाहर आने के लिए आवाज़ दी थी
नहीं, अब वहाँ कोई नहीं है
मतलब की इबारत से होकर
सब के सब व्यवस्था के पक्ष में
चले गए हैं। लेखपाल की
भाषा के लम्बे सुनसान में
जहाँ पालो और बंजर का फ़र्क़
मिट चुका है चन्द खेत
हथकड़ी पहने खड़े हैं।

और विपक्ष में -
सिर्फ़ कविता है।
सिर्फ़ हज्जाम की खुली हुई ‘किसमत’ में एक उस्तुरा -
चमक रहा है।
सिर्फ़ भंगी का एक झाड़ू हिल रहा है
नागरिकता का हक़ हलाल करती हुई
गन्दगी के ख़िलाफ़।

और तुम हो, विपक्ष में
बेकारी और नींद से परेशान।

और एक जंगल है -
मतदान के बाद ख़ून में अन्धेरा
पछींटता हुआ।
(जंगल मुख़बिर है)
उसकी आँखों में
चमकता हुआ भाईचारा
किसी भी रोज़ तुम्हारे चेहरे की हरियाली को
बेमुरव्वत, चाट सकता है।

ख़बरदार!
उसने तुम्हारे परिवार को
नफ़रत के उस मुक़ाम पर ला खड़ा किया है
कि कल तुम्हारा सबसे छोटा लड़का भी
तुम्हारे पड़ोसी का गला
अचानक,
अपनी स्लेट से काट सकता है।
क्या मैंने ग़लत कहा?
आख़िरकार… आख़िरकार…

शनिवार, 15 जून 2024

कहानी: भोलाराम का जीव (लेखक: हरिशंकर परसाई)

  

भोलाराम का जीव

हरिशंकर परसाई


सा कभी नहीं हुआ था... 
धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफ़ारिश के आधार पर स्वर्ग या नर्क में निवास-स्थान 'अलॉट' करते आ रहे थे। पर ऐसा कभी नहीं हुआ था।

सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर पर रजिस्टर देख रहे थे। ग़लती पकड़ में ही नहीं आ रही थी। आख़िर उन्होंने खीझ कर रजिस्टर इतने ज़ोर से बंद किया कि मक्खी चपेट में आ गई। उसे निकालते हुए वे बोले, "महाराज, रिकार्ड सब ठीक है। भोलाराम के जीव ने पाँच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना भी हुआ, पर यहाँ अभी तक नहीं पहुँचा।"

धर्मराज ने पूछा, "और वह दूत कहाँ है?"
महाराज, "वह भी लापता है।"

इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बदहवास वहाँ आया। उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था। उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे, "अरे, तू कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है?"

यमदूत हाथ जोड़ कर बोला, "दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊँ कि क्या हो गया। आज तक मैंने धोखा नहीं खाया था, पर भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया। पाँच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम का देह त्यागा, तब मैंने उसे पकड़ा और इस लोक की यात्रा आरंभ की। नगर के बाहर ज्यों ही मैं उसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ त्यों ही वह मेरी चंगुल से छूट कर न जाने कहाँ ग़ायब हो गया। इन पाँच दिनों में मैंने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर उसका कहीं पता नहीं चला।" 

धर्मराज क्रोध से बोला, "मूर्ख! जीवों को लाते-लाते बूढ़ा हो गया फिर भी एक मामूली बूढ़े आदमी के जीव ने तुझे चकमा दे दिया।" 

दूत ने सिर झुका कर कहा, "महाराज, मेरी सावधानी में बिलकुल कसर नहीं थी। मेरे इन अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके। पर इस बार तो कोई इंद्रजाल ही हो गया।" 

चित्रगुप्त ने कहा, "महाराज, आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है। लोग दोस्तों को कुछ चीज़ भेजते हैं और उसे रास्ते में ही रेलवे वाले उड़ा लेते हैं। होजरी के पार्सलों के मोज़े रेलवे अफ़सर पहनते हैं। मालगाड़ी के डब्बे के डब्बे रास्ते में कट जाते हैं। एक बात और हो रही है। राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ाकर बंद कर देते हैं। कहीं भोलाराम के जीव को भी तो किसी विरोधी ने मरने के बाद ख़राबी करने के लिए तो नहीं उड़ा दिया?" 

धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा, "तुम्हारी भी रिटायर होने की उम्र आ गई। भला भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी से किसी को क्या लेना-देना?" 

इसी समय कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि यहाँ आ गए। धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले, "क्यों धर्मराज, कैसे चिंतित बैठे हैं? क्या नर्क में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?" 

धर्मराज ने कहा, "वह समस्या तो कब की हल हो गई, मुनिवर! नर्क में पिछले सालों में बड़े गुणी कारीगर आ गए हैं। कई इमारतों के ठेकेदार हैं जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनाईं। बड़े बड़े इंजीनियर भी आ गए हैं जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया। ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मज़दूरों की हाज़िरी भर कर पैसा हड़पा जो कभी काम पर गए ही नहीं। इन्होंने बहुत जल्दी नर्क में कई इमारतें तान दी हैं। वह समस्या तो हल हो गई, पर एक बड़ी विकट उलझन आ गई है। भोलाराम नाम के एक आदमी की पाँच दिन पहले मृत्यु हुई। उसके जीव को यह दूत यहाँ ला रहा था, कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया। इस ने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला। अगर ऐसा होने लगा, तो पाप पुण्य का भेद ही मिट जाएगा।" 

नारद ने पूछा, "उस पर इनकमटैक्स तो बक़ाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगों ने रोक लिया हो।" 

चित्रगुप्त ने कहा, "इनकम होती तो टैक्स होता... भुखमरा था।" 

नारद बोले, "मामला बड़ा दिलचस्प है। अच्छा मुझे उसका नाम पता तो बताओ। मैं पृथ्वी पर जाता हूँ।" 

चित्रगुप्त ने रजिस्टर देख कर बताया, "भोलाराम नाम था उसका। जबलपुर शहर में धमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ़ कमरे टूटे-फूटे मकान में वह परिवार समेत रहता था। उसकी एक स्त्री थी, दो लड़के और एक लड़की। उम्र लगभग साठ साल। सरकारी नौकर था। पाँच साल पहले रिटायर हो गया था। मकान का किराया उसने एक साल से नहीं दिया, इस लिए मकान मालिक उसे निकालना चाहता था। इतने में भोलाराम ने संसार ही छोड़ दिया। आज पाँचवाँ दिन है। बहुत संभव है कि अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक है तो उसने भोलाराम के मरते ही उसके परिवार को निकाल दिया होगा। इस लिए आप को परिवार की तलाश में काफ़ी घूमना पड़ेगा।" 

माँ-बेटी के सम्मिलित क्रन्दन से ही नारद भोलाराम का मकान पहचान गए। 

द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज़ लगाई, "नारायण! नारायण! लड़की ने देखकर कहा- आगे जाओ महाराज।" 

नारद ने कहा, "मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछ-ताछ करनी है। अपनी माँ को ज़रा बाहर भेजो, बेटी!" 

भोलाराम की पत्नी बाहर आई। नारद ने कहा, "माता, भोलाराम को क्या बीमारी थी?" 

"क्या बताऊँ? ग़रीबी की बीमारी थी। पाँच साल हो गए, पेंशन पर बैठे। पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख़्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब आता ही नहीं था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में सब गहने बेच कर हम लोग खा गए। फिर बरतन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। चिंता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दी।" 

नारद ने कहा, "क्या करोगी माँ? उनकी इतनी ही उम्र थी।" 

"ऐसा तो मत कहो, महाराज! उम्र तो बहुत थी। पचास साठ रुपया महीना पेंशन मिलती तो कुछ और काम कहीं कर के गुज़ारा हो जाता। पर क्या करें? पाँच साल नौकरी से बैठे हो गए और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली।" 

दुःख की कथा सुनने की फ़ुरसत नारद को थी नहीं। वे अपने मुद्दे पर आए, "माँ, यह तो बताओ कि यहाँ किसी से उनका विशेष प्रेम था, जिसमें उनका जी लगा हो?" 

पत्नी बोली, "लगाव तो महाराज, बाल बच्चों से ही होता है।" 

"नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है। मेरा मतलब है, किसी स्त्री..." 

स्त्री ने ग़ुर्रा कर नारद की ओर देखा। बोली, "अब कुछ मत बको महाराज! तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो। ज़िंदगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री की ओर आँख उठाकर नहीं देखा।" 

नारद हँस कर बोले, "हाँ, तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है। यही हर अच्छी गृहस्थी का आधार है। अच्छा, माता मैं चला।" 

स्त्री ने कहा, "महाराज, आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरूष हैं। कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उनकी रुकी हुई पेंशन मिल जाए। इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाए।" 

नारद को दया आ गई थी। वे कहने लगे, "साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं। फिर भी मैं सरकारी दफ़्तर जाऊँगा और कोशिश करूँगा।" 

वहाँ से चल कर नारद सरकारी दफ़्तर पहुँचे। वहाँ पहले ही से कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस के बारे में बातें कीं। उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला, "भोलाराम ने दरख़्वास्तें तो भेजी थीं, पर उन पर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होंगी।" 

नारद ने कहा, "भई, ये बहुत से 'पेपर-वेट' तो रखे हैं। इन्हें क्यों नहीं रख दिया?" 

बाबू हँसा, "आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती। दरख़्वास्तें 'पेपरवेट' से नहीं दबतीं। ख़ैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए।" 

नारद उस बाबू के पास गए। उसने तीसरे के पास भेजा, तीसरे ने चौथे के पास चौथे ने पाँचवे के पास। जब नारद पच्चीस-तीस बाबुओं और अफ़सरों के पास घूम आए तब एक चपरासी ने कहा, "महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गए। अगर आप साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नहीं होगा। आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए। उन्हें ख़ुश कर दिया तो अभी काम हो जाएगा।" 

नारद बड़े साहब के कमरे में पहुँचे। बाहर चपरासी ऊँघ रहा था। इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं। बिना 'विजिटिंग कार्ड' के आया देख साहब बड़े नाराज़ हुए। बोले, "इसे कोई मंदिर वन्दिर समझ लिया है क्या? धड़धड़ाते चले आए! चिट क्यों नहीं भेजी?" 

नारद ने कहा, "कैसे भेजता? चपरासी सो रहा है।" 

"क्या काम है? साहब ने रौब से पूछा।" 

नारद ने भोलाराम का पेंशन केस बतलाया। 

साहब बोले, "आप हैं बैरागी। दफ़्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते। असल में भोलाराम ने गलती की। भई, यह भी एक मंदिर है। यहाँ भी दान पुण्य करना पड़ता है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं। भोलाराम की दरख़्वास्तें उड़ रही हैं। उन पर वज़न रखिए।" 

नारद ने सोचा कि फिर यहाँ वज़न की समस्या खड़ी हो गई। साहब बोले, "भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेंशन का केस बीसों दफ़्तर में जाता है। देर लग ही जाती है। बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है। जितनी पेंशन मिलती है उतने की स्टेशनरी लग जाती है। हाँ, जल्दी भी हो सकती है मगर..." साहब रुके। 

नारद ने कहा, "मगर क्या?" 

साहब ने कुटिल मुसकान के साथ कहा, "मगर वज़न चाहिए। आप समझे नहीं। जैसे आपकी यह सुंदर वीणा है, इसका भी वज़न भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है। मेरी लड़की गाना बजाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूँगा। साधु-सन्तों की वीणा से तो और अच्छे स्वर निकलते हैं।" 

नारद अपनी वीणा छिनते देख जरा घबराए। पर फिर संभल कर उन्होंने वीणा टेबिल पर रख कर कहा, "यह लीजिए। अब जरा जल्दी उसकी पेंशन ऑर्डर निकाल दीजिए।" 

साहब ने प्रसन्न्ता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घण्टी बजाई। चपरासी हाजिर हुआ। 

साहब ने हुक्म दिया, "बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फ़ाइल लाओ।" 

थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ-डेढ़-सौ दरख्वास्तों से भरी फ़ाइल ले कर आया। उसमें पेंशन के कागजात भी थे। साहब ने फ़ाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा, "क्या नाम बताया साधु जी आपने?" 

नारद समझे कि साहब कुछ ऊँचा सुनता है। इसलिए जोर से बोले, "भोलाराम!" 

सहसा फ़ाइल में से आवाज आई, "कौन पुकार रहा है मुझे। पोस्टमैन है? क्या पेंशन का ऑर्डर आ गया?" 

नारद चौंके। पर दूसरे ही क्षण बात समझ गए। बोले, "भोलाराम! तुम क्या भोलाराम के जीव हो?" 

"हाँ!" आवाज आई। 

नारद ने कहा, "मैं नारद हूँ। तुम्हें लेने आया हूँ। चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतज़ार हो रहा है।" 

आवाज आई, "मुझे नहीं जाना। मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों पर अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है।
मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता।

शनिवार, 8 जून 2024

कहानी: तमाशा (लेखक: सआदत हसन मंटो)

 

तमाशा

सआदत हसन मंटो


दो-तीन रोज़ से हवाई जहाज सियाह उकाबों की तरह पर फैलाए खामोश फ़िज़ा में मंडरा रहे थे, जैसे वे किसी शिकार की तलाश में हों, सुर्ख आँधियाँ वक्त-बेवक्त किसी आने वाले खूनी हादसे का पैगाम ला रही थीं, सुनसान बाजारों में सशस्त्र पुलिस की गश्त एक अजीब भयावह समा पेश कर रही थी, वे बाजार, जो आज से कुछ अरसे पहले लोगों के हुजूम से भरे हुआ करते थे, अब किसी नामालूम खौफ की वजह से सूने पड़े थे-शहर की फिजा पर एक रहस्यमयी खामोशी छायी हुई थी और भयानक खौफ राज कर रहा था ।

खालिद घर की खामोश और स्तब्ध फिजा से सहमा हुआ अपने वालिद के करीब बैठा बातें कर रहा था, "अब्बा, आप मुझे स्कूल क्यों नहीं जाने देते ?"

"बेटा, आज, स्कूल में छुट्टी है।"

"मास्टर साहब ने तो हमें बताया ही नहीं, वह तो कल कह रहे थे कि जो लड़का आज स्कूल का काम खत्म करके अपनी कापी नहीं दिखलाएगा, उसे सख्त सजा दी जाएगी।"

"वह बतलाना भूल गए होंगे।" "आपके दफतर में छुट्टी होगी ?"

"हाँ, हमारा दफ्तर भी आज बंद है।"

"चलो अच्छा हुआ, आज आपसे कोई अच्छी-सी कहानी सुनूंगा ।"

यह बातें हो रही थीं कि तीन-चार जहाज चीखते हुए उनके सिर पर से गुजर गए। खालिद उनको देखकर बहुत भयभीत हो गया। वह तीन-चार रोज से इन जहाजों को गौर से देख रहा था, मगर किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सका। वह हैरान था कि ये जहाज सारा दिन धूप में क्यों चक्कर लगाते रहते हैं। वह उनकी रोजाना की गतिविधि से सख्त तंग आकर बोला, "अब्बा, मुझे इन जहाजों से सख्त खौफ मालूम हो रहा है। आप इनके चलाने वालों से पहले कह दें कि वे हमारे घर से न गुजरा करें।"

"खौफ? कहीं पागल तो नहीं हो गए खालिद !"

"अब्बा, ये जहाज बहुत खौफनाक हैं। आप नहीं जानते ये किसी न किसी दिन हमारे घर पर गोला फेंक देंगे। कल सुबह मामा अम्मीजान से कह रही थीं कि इन जहाज वालों के पास बहुत-से गोले हैं। अब्बा, अगर उन्होंने इस किस्म की कोई शरारत की तो याद रखें, मेरे पास भी एक बन्दूक है, वही जो आपने मुझे पिछली ईद पर लाकर दी थी।"

खालिद के अब्बा ने अपने लड़के के गैरमामूली साहस पर हँसते हुए कहा, "मामा तो पागल हैं, मैं उनसे दरयाफ्त करूंगा कि वह घर में ऐसी बात क्यों करती हैं। इत्मीनान रखो, वे ऐसी बात कभी नहीं करेंगी।"

अपने वालिद से रुख्सत होकर खालिद अपने कमरे में चला गया और हवाई बन्दूक निकालकर निशाने लगाने का अभ्यास करने लगा ताकि उस रोज, हवाई जहाज वाले गोले फेंकें, तो उसका निशाना न चूक जाए और वह पूरी तरह बदला ले सके। काश! प्रतिशोध का वही नन्हा जज़्बा हर शख्स में पैदा हो जाए।

इसी अर्से में जबकि एक नन्हा बच्चा अपनी बदला लेने की फिक्र में डूबा हुआ तरह-तरह से मनसूबे बाँध रहा था, घर के दूसरे हिस्से में खालिद का अब्बा अपनी बीवी के पास बैठा हुआ मामा को हिदायत कर रहा था कि वह आगे से घर में इस किस्म की कोई बात न करें जिससे खालिद को दहशत हो। मामा को और बीवी को इस किस्म की ताकीद करके वह अभी बड़े दरवाजे से बाहर जा रहा था कि खादिम एक भयानक खबर लाया कि शहर के लोग बादशाह के मना करने पर भी शाम के करीब एक आम जलसा करने वाले हैं। और यह आशा की जाती है कि कोई न कोई दुर्घटना जरूर पेश आकर रहेगी।

खालिद का अब्बा यह खबर सुनकर बहुत खौफज़दा हुआ। अब उसे यकीन हो गया कि माहौल का गैरमामूली सुकून, जहाजों की उड़ान, बाजारों में सशस्त्र पुलिस की गश्त, लोगों के चेहरों पर उदासी का आलम और खूनी आँधियों की आमद किसी खौफनाक हादसे के आसार थे। वह हादसा किस किस्म का होगा यह खालिद के अब्बा की तरह किसी को भी मालूम नहीं था। मगर फिर भी सारा शहर किसी नामालूम खौफ से लिपटा हुआ था। बाजार जाने के ख्याल को तर्क करके खालिद का अब्बा अभी कपड़े भी नहीं बदल पाया था कि जहाजों का शोर बुलन्द हुआ। वह सहम गया। उसे लगा, जैसे सैकड़ों इंसान एक-सी आवाज में दर्द की शिद्दत से कराह रहे हैं। खालिद जहाजों का शोरगुल सुनकर अपनी हवाई बंदूक सँभालता हुआ कमरे से बाहर दौड़ आया और उन्हें गौर से देखने लगा, ताकि वे जिस वक्त गोला फेंकने लगें, तो वह अपनी हवाई बन्दूक की मदद से उन्हें नीचे गिरा दे। इस वक्त इस छह साला बच्चे के चेहरे पर मजबूत इरादा और दृढ़ निश्चय के लक्षण प्रकट थे जो कम हकीकत बन्दूक का खिलौना हाथ में थामे एक वीर सिपाही को शर्मिन्दा कर रहा था। मालूम होता था कि वह आज इस चीज को, जो उसे अरसे से खौफजदा कर रही थी, मिटाने पर तुला हुआ है। खालिद के देखते-देखते एक जहाज से कुछ चीज गिरी, जो कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों के समान थी- गिरते ही वे टुकड़े हवा में पतंगों की तरह उड़ने लगे। इनमें से चन्द खालिद के मकान की छत पर भी गिरे। खालिद भागता हुआ ऊपर गया और कागज उठाकर अपने वालिद के पास ले गया।

"अब्बाजी! मामा सचमुच झूठ बक रही थी, जहाज वालों ने तो गोलों को बजाय ये कागज फेंके हैं।"

खालिद के बाप ने वह कागज लेकर पढ़ना शुरू किया तो रंग ज़र्द हो गया - होने वाले हादसे की तस्वीर अब उसे साफ तौर पर नजर आने लगी। उस इश्तहार में साफ़ लिखा था कि बादशाह किसी को जलसा करने की इजाज़त नहीं देता और अगर उसकी मर्ज़ी के खिलाफ कोई जलसा किया गया तो अंजाम की जिम्मेदार स्वयं जनता होगी। अपने वालिद को इश्तहार पढ़ने के बाद इस कदर हैरान देखकर खालिद ने घबराते हुए पूछा, "इस कागज में यह तो नहीं लिखा कि वे हमारे घर पर गोले फेंकेंगे?"

"खालिद, इस वक्त तुम जाओ... जाओ, अपनी बन्दूक के साथ खेलो।"

 "मगर इसमें लिखा क्या है?"

"लिखा है, आज शाम को एक तमाशा होगा।"

खालिद के बाप ने गुफ्तगू को अधिक बढ़ाने के डर से झूठ बोलते हुए कहा, "तमाशा होगा।"

"फिर तो हम भी चलेंगे न?"

"क्या कहा?"

"क्या इस तमाशे में आप मुझे नहीं ले चलेंगे?"

"ले चलेंगे, अब जाओ, जाकर खेलो।"

"कहाँ खेलूं? बाजार में आप मुझे जाने नहीं देते। मामा मुझसे खेलती नहीं। मेरा सहपाठी भी तो आजकल यहाँ नहीं आता। अब आप ही बताएँ, मैं खेलूं तो किससे खेलूं! शाम के वक्त तमाशा देखने तो जरूर चलेंगे न?" किसी जवाब का इन्तजार किए बगैर खालिद कमरे से बाहर चला गया और अलग-अलग कमरों में आवारा फिरता हुआ अपने वालिद की बैठक में पहुँचा जिसकी खिड़कियाँ बाजार की तरफ खुलती थीं। खिड़की के करीब जाकर वह बाजार की तरफ देखने लगा तो क्या देखता कि बाजार में दुकानें बन्द है, मगर आना-जाना जारी है। लोग जलसे में शामिल होने के लिए जा रहे थे। वह सख्त हैरान था कि दुकानें क्यों बन्द रहती हैं। इस मसले के हल के लिए उसने अपने नन्हे दिमाग पर बहुत जोर दिया, मगर कोई नतीजा न निकाल सका । बहुत सोच-विचार के बाद उसने सोचा कि लोगों ने वह तमाशा देखने की खातिर, जिसके इश्तहार जहाज बाँट रहे थे, दुकानें बन्द कर रखी हैं। अब उसने खयाल किया कि वह कोई निहायत ही दिलचस्प तमाशा होगा, जिसके लिए तमाम बाजार बन्द हैं। इस ख्याल ने खालिद को सख्त बेचैन कर दिया और वह उस वक्त का बेकरारी से इन्तजार करने लगा जब अब्बा उसे तमाशा दिखाने ले चलेंगे ।

वक्त गुजरता गया... वह खूनी घड़ी करीबतर आती गयी।

तीसरे पहर का वक्त था। खालिद, उसका बाप और माँ सहन में चुप बैठे एक-दूसरे की तरफ खामोश निगाहों से ताक रहे थे। हवा सिसकियां भरती हुई चल रही थी। तड़-तड़ की आवाज़ सुनते ही खालिद के बाप के चेहरे का रंग कागज़ की तरह सफ़ेद हो गया। जबान से मुश्किल से इतना ही कह सका, "गोली!"

खालिद की माँ भयातिरेक से एक शब्द भी मुँह से न निकाल सकी। गोली का नाम सुनते ही ऐसा मालूम हुआ जैसे उसकी छाती में गोली उतर रही है। खालिद इस आवाज को सुनते ही अपनी वालिद की अँगुली पकड़कर कहने लगा, "अब्बा जी, चलो चलें! तमाशा तो शुरू हो गया है।"

"कौन-सा तमाशा ?" खालिद के बाप ने अपने खौफ को छुपाते हुए कहा।

"वही तमाशा, जिसके इश्तहार आज सुबह हजाज बाँट रहे थे... खेल शुरू हो गया है, तभी तो इतने पटाखों की आवाज सुनाई दे रही है।"

"अभी बहुत वक्त बाकी है। तुम शोर मत करो - अब जाओ, मामा के पास जाकर खेलो।" खालिद यह सुनते ही बावर्चीखाने की तरफ रवाना हो गया मगर वहाँ मामा को न पाकर अपने वालिद की बैठक में जाकर खिड़की से बाजार की तरफ देखने लगा। बाजार आमदोरफ्त बन्द हो जाने की वजह से साँय-साँय कर रहा था। दूर फासले से कुत्तों की दर्दनाक चीखें सुनाई दे रही थीं। कुछ क्षणों के बाद इन चीखों में इंसानों की दर्दनाक आवाजें शामिल हो गयीं। खालिद किसी को कराहते सुनकर बहुत हैरान हुआ। अभी वह इस आवाज की जुस्तजू के लिए कोशिश कर ही रहा था कि चौक में उसे एक लड़का दिखायी दिया जो चीखता-चिल्लाता भागता चला आ रहा था। खालिद के कमरे के ठीक सामने वह लड़का लड़खड़ाकर गिरा और गिरते ही बेहोश हो गया। उसकी पिंडली पर गहरा ज़ख्म था जिससे फव्वारों खून निकल रहा था। यह दृश्य देखकर खालिद बहुत खौफजदा हुआ। भागकर अपने वालिद के पास आया और कहने लगा, "अब्बा! अब्बा! बाजार में एक लड़का गिरा पड़ा है। उसकी टाँग से बहुत खून निकल रहा है।"

खालिद का बाप यह सुनते ही खिड़की की तरफ गया और देखा कि वाकई एक नौजवान बाजार में औंधे मुंह पड़ा है। बादशाह के खौफ के कारण किसी में इतना साहस नहीं था कि उस लड़के को सड़क पर से उठाकर सामने वाली दुकान के पट्टे पर लिटा दे।

"अब्बा, इस लड़के को किसी ने पीटा है ?"
खालिद का बाप हाँ में सिर हिलाता कमरे के बाहर चला गया।

अब खालिद कमरे में अकेला रह गया। वह सोचने लगा कि इस लड़के को इतने बड़े जख्म से कितनी तकलीफ हुई होगी, जबकि एक दफा उसे चाकू चुभने से ही तमाम रात नींद नहीं आयी थी। उसका बाप और उसकी माँ तमाम रात उसके सिरहाने बैठे रहे थे। इस ख्याल के आते ही उसे ऐसा मालूम होने लगा कि जैसे वह जख्म खुद उसकी पिडली में है और उसमें बहुत तेज दर्द है। यह एकदम रोने लगा।

खालिद के रोने की आवाज सुनकर, उसकी माँ दौड़ती-दौड़ती आयी और उसको गोद में लेकर पूछने लगी, "मेरे बच्चे रो क्यों रहे हो?"

"अम्मी, उसे किसी ने मारा है।"

"शरारत की होगी उसने।"

"मगर स्कूल में तो छड़ी से सज़ा देते हैं। लहू तो नहीं निकालते।"

"छड़ी जोर से लग गयी होगी।"

"तो फिर क्यों इस लड़के को इस कदर मारा है। एक रोज जब मास्टर साहब ने मेरे कान खींचकर सुर्ख कर दिए तो अब्बा जी ने हैडमास्टर के पास शिकायत की थी न!" 

"इस लड़के का मास्टर बहुत बड़ा आदमी है।"

"अल्लाह मियाँ से भी बड़ा?"

"नहीं, उनसे छोटा है।"

"तो, फिर वह अल्लाह मियाँ के पास शिकायत करेगा?"

"अब देर हो गयी है, चलो सोएँ।"

"अल्लाह मियाँ, मैं दुआ करता हूँ कि तू उस मास्टर को जिसने इस लड़के को पीटा है, अच्छी तरह सजा दे और उस छड़ी को छीन ले जिसके इस्तेमाल से खून निकल आता है.. मैंने पहाड़े याद नहीं किए इसलिए मुझे डर है कि कहीं वही छड़ी मेरे उस्ताद के हाथ न आ जाए। अगर तुमने मेरी बात न मानी तो फिर मैं भी तुमसे नहीं बोलूंगा !" सोते वक्त खालिद दिल में दुआ माँग रहा था।

सोमवार, 3 जून 2024

कहानी: जामुन का पेड़ (लेखक: कृष्ण चन्दर)

   

जामुन का पेड़ 

कृष्ण चन्दर


रात को बड़े ज़ोर का अंधड़ चला। सेक्रेटेरिएट के लॉन में जामुन का एक पेड़ गिर पड़ा। सुबह जब माली ने देखा तो उसे मालूम हुआ कि पेड़ के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है।

माली दौड़ा-दौड़ा चपरासी के पास गया, चपरासी दौड़ा-दौड़ा क्‍लर्क के पास गया, क्‍लर्क दौड़ा-दौड़ा सुपरिन्‍टेंडेंट के पास गया। सुपरिन्‍टेंडेंट दौड़ा-दौड़ा बाहर लॉन में आया। मिनटों में ही गिरे हुए पेड़ के नीचे दबे आदमी के इर्दगिर्द मजमा इकट्ठा हो गया।

“बेचारा जामुन का पेड़ कितना फलदार था।” एक क्‍लर्क बोला।

“इसकी जामुन कितनी रसीली होती थी।” दूसरा क्‍लर्क बोला।

“मैं फलों के मौसम में झोली भरके ले जाता था। मेरे बच्‍चे इसकी जामुनें कितनी ख़ुशी से खाते थे।” तीसरे क्‍लर्क का यह कहते हुए गला भर आया।

“मगर यह आदमी?” माली ने पेड़ के नीचे दबे आदमी की तरफ़ इशारा किया।

“हाँ, यह आदमी…” सुपरिन्‍टेंडेंट सोच में पड़ गया।

“पता नहीं ज़िंदा है कि मर गया।” एक चपरासी ने पूछा।

“मर गया होगा। इतना भारी तना जिसकी पीठ पर गिरे, वह बच कैसे सकता है?” दूसरा चपरासी बोला।

“नहीं मैं ज़िंदा हूँ।” दबे हुए आदमी ने बमुश्किल कराहते हुए कहा।

“ज़िंदा है?” एक क्‍लर्क ने हैरत से कहा।

“पेड़ को हटाकर इसे निकाल लेना चाहिए।” माली ने मशविरा दिया।

“मुश्किल मालूम होता है।” एक काहिल और मोटा चपरासी बोला। “पेड़ का तना बहुत भारी और वज़नी है।”

“क्‍या मुश्किल है?” माली बोला। “अगर सुपरिन्‍टेंडेंट साहब हुकम दें तो अभी पंद्रह बीस माली, चपरासी और क्‍लर्क ज़ोर लगा के पेड़ के नीचे दबे आदमी को निकाल सकते हैं।”

“माली ठीक कहता है।” बहुत से क्‍लर्क एक साथ बोल पड़े। “लगाओ ज़ोर हम तैयार हैं।”

एकदम बहुत से लोग पेड़ को काटने पर तैयार हो गए।

“ठहरो।”, सुपरिन्‍टेंडेंट बोला, “मैं अंडर-सेक्रेटरी से मशविरा कर लूँ।”

सु‍परिन्‍टेंडेंट अंडर सेक्रेटरी के पास गया। अंडर सेक्रेटरी डिप्‍टी सेक्रेटरी के पास गया। डिप्‍टी सेक्रेटरी जाइंट सेक्रेटरी के पास गया। जाइंट सेक्रेटरी चीफ़ सेक्रेटरी के पास गया। चीफ़ सेक्रेटरी ने जाइंट सेक्रेटरी से कुछ कहा। जाइंट सेक्रेटरी ने डिप्‍टी सेक्रेटरी से कहा। डिप्‍टी सेक्रेटरी ने अंडर सेक्रेटरी से कहा। फ़ाइल चलती रही। इसी में आधा दिन गुज़र गया।

दोपहर को खाने पर, दबे हुए आदमी के इर्दगिर्द बहुत भीड़ हो गई थी। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। कुछ मनचले क्‍लर्कों ने मामले को अपने हाथ में लेना चाहा। वह हुकूमत के फ़ैसले का इंतज़ार किए बग़ैर पेड़ को ख़ुद से हटाने की तैयारी कर रहे थे कि इतने में, सुपरिन्‍टेंडेंट फाइल लिए भागा-भागा आया, बोला, “हम लोग ख़ुद से इस पेड़ को यहाँ से नहीं हटा सकते। हम लोग वाणिज्‍य विभाग के कर्मचारी हैं और यह पेड़ का मामला है, पेड़ कृषि विभाग के तहत आता है। इसलिए मैं इस फ़ाइल को अर्जेंट मार्क करके कृषि विभाग को भेज रहा हूँ। वहाँ से जवाब आते ही इसको हटवा दिया जाएगा।”

दूसरे दिन कृषि विभाग से जवाब आया कि पेड़ हटाने की ज़िम्मेदारी तो वाणिज्‍य विभाग की ही बनती है।

यह जवाब पढ़कर वाणिज्‍य विभाग को गुस्‍सा आ गया। उन्‍होंने फ़ौरन लिखा कि पेड़ों को हटवाने या न हटवाने की ज़िम्मेदारी कृषि विभाग की ही है। वाणिज्‍य विभाग का इस मामले से कोई ताल्‍लुक़ नहीं है।

दूसरे दिन भी फ़ाइल चलती रही। शाम को जवाब आ गया, “हम इस मामले को हार्टिकल्‍चर विभाग के सुपुर्द कर रहे हैं, क्‍योंकि यह एक फलदार पेड़ का मामला है और कृषि विभाग सिर्फ़ अनाज और खेती-बाड़ी के मामलों में फ़ैसला करने का हक़ रखता है। जामुन का पेड़ एक फलदार पेड़ है, इसलिए पेड़ हार्टिकल्‍चर विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है।”

रात को माली ने दबे हुए आदमी को दाल-भात खिलाया। हालाँकि लॉन के चारों तरफ़ पुलिस का पहरा था, कि कहीं लोग क़ानून को अपने हाथ में लेकर पेड़ को ख़ुद से हटवाने की कोशिश न करें। मगर एक पुलिस कांस्‍टेबल को रहम आ गया और उसने माली को दबे हुए आदमी को खाना खिलाने की इजाज़त दे दी।

माली ने दबे हुए आदमी से कहा, “तुम्‍हारी फ़ाइल चल रही है। उम्‍मीद है कि कल तक फ़ैसला हो जाएगा।”

दबा हुआ आदमी कुछ न बोला।

माली ने पेड़ के तने को ग़ौर से देखकर कहा, “अच्‍छा है तना तुम्‍हारे कूल्‍हे पर गिरा। अगर कमर पर गिरता तो रीढ़ की हड्डी टूट जाती।”

दबा हुआ आदमी फिर भी कुछ न बोला।

माली ने फिर कहा, “तुम्‍हारा यहाँ कोई वारिस हो तो मुझे उसका अता-पता बताओ। मैं उसे ख़बर देने की कोशिश करूँगा।”

“मैं लावारिस हूँ।” दबे हुए आदमी ने बड़ी मुश्किल से कहा।

माली अफ़सोस ज़ाहिर करता हुआ वहाँ से हट गया।

तीसरे दिन हार्टिकल्‍चर विभाग से जवाब आ गया। बड़ा कड़ा जवाब लिखा गया था। काफ़ी आलोचना के साथ। उससे हार्टिकल्‍चर विभाग का सेक्रेटरी साहित्यिक मिज़ाज का आदमी मालूम होता था। उसने लिखा था, “हैरत है, इस समय जब ‘पेड़ उगाओ’ स्‍कीम बड़े पैमाने पर चल रही है, हमारे मुल्‍क में ऐसे सरकारी अफ़सर मौजूद हैं, जो पेड़ काटने की सलाह दे रहे हैं, वह भी एक फलदार पेड़ को! और वह भी जामुन के पेड़ को! जिसके फल जनता बड़े चाव से खाती है। हमारा विभाग किसी भी हालत में इस फलदार पेड़ को काटने की इजाज़त नहीं दे सकता।”

“अब क्‍या किया जाए?” एक मनचले ने कहा, “अगर पेड़ नहीं काटा जा सकता तो इस आदमी को काटकर निकाल लिया जाए! यह देखिए…”,

उस आदमी ने इशारे से बताया, “अगर इस आदमी को बीच में से यानी धड़ की जगह से काटा जाए, तो आधा आदमी इधर से निकल आएगा और आधा आदमी उधर से बाहर आ जाएगा और पेड़ भी वहीं का वहीं रहेगा।”

“मगर इस तरह से तो मैं मर जाऊँगा!” दबे हुए आदमी ने एतराज़ किया।

“यह भी ठीक कहता है।” एक क्‍लर्क बोला।

आदमी को काटने का नायाब तरीक़ा पेश करने वाले ने एक पुख़्ता दलील पेश की, “आप जानते नहीं हैं। आजकल प्‍लास्टिक सर्जरी के जरिए धड़ की जगह से, इस आदमी को फिर से जोड़ा जा सकता है।”

अब फ़ाइल को मेडिकल डिपार्टमेंट में भेज दिया गया। मेडिकल डिपार्टमेंट ने फ़ौरन इस पर एक्‍शन लिया और जिस दिन फ़ाइल मिली उसने उसी दिन विभाग के सबसे क़ाबिल प्‍लास्टिक सर्जन को जाँच के लिए मौक़े पर भेज दिया।

सर्जन ने दबे हुए आदमी को अच्‍छी तरह टटोलकर, उसकी सेहत देखकर, ख़ून का दबाव, साँस की गति, दिल और फेफड़ों की जाँच करके रिपोर्ट भेज दी कि, “इस आदमी का प्‍लास्टिक ऑपरेशन तो हो सकता है, और ऑपरेशन कामयाब भी हो जाएगा, मगर आदमी मर जाएगा।

लिहाज़ा यह सुझाव भी रद्द कर दिया गया।

रात को माली ने दबे हुए आदमी के मुँह में खिचड़ी डालते हुए उसे बताया, “अब मामला ऊपर चला गया है। सुना है कि सेक्रेटेरियट के सारे सेक्रेटरियों की मीटिंग होगी। उसमें तुम्‍हारा केस रखा जाएगा। उम्‍मीद है सब काम ठीक हो जाएगा।”

दबा हुआ आदमी एक आह भरकर आहिस्‍ते से बोला, “हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जाएँगे हम, तुमको ख़बर होने तक।”

माली ने अचम्भे से मुँह में उँगली दबायी। हैरत से बोला, “क्‍या तुम शायर हो।”

दबे हुए आदमी ने आहिस्‍ते से सर हिला दिया।

दूसरे दिन माली ने चपरासी को बताया, चपरासी ने क्‍लर्क को और क्‍लर्क ने हेड-क्‍लर्क को। थोड़ी ही देर में सेक्रेटेरिएट में यह बात फैल गई कि दबा हुआ आदमी शायर है। बस फिर क्‍या था। लोग बड़ी संख्‍या में शायर को देखने के लिए आने लगे। इसकी ख़बर शहर में फैल गई। और शाम तक मुहल्‍ले-मुहल्‍ले से शायर जमा होना शुरू हो गए। सेक्रेटेरिएट का लॉन भाँति-भाँति के शायरों से भर गया। सेक्रेटेरिएट के कई क्‍लर्क और अंडर-सेक्रेटरी तक, जिन्‍हें अदब और शायर से लगाव था, रुक गए। कुछ शायर दबे हुए आदमी को अपनी ग़ज़लें सुनाने लगे, कई क्‍लर्क अपनी ग़ज़लों पर उससे सलाह मशविरा माँगने लगे।

जब यह पता चला कि दबा हुआ आदमी शायर है, तो सेक्रेटेरिएट की सब-कमेटी ने फ़ैसला किया कि चूँकि दबा हुआ आदमी एक शायर है, लिहाज़ा इस फ़ाइल का ताल्‍लुक़ न तो कृषि विभाग से है और न ही हार्टिकल्‍चर विभाग से बल्कि सिर्फ़ संस्‍कृति विभाग से है। अब संस्‍कृति विभाग से गुज़ारिश की गई कि वह जल्‍द से जल्‍द इस मामले में फ़ैसला करे और इस बदनसीब शायर को इस पेड़ के नीचे से रिहाई दिलवायी जाए।

फ़ाइल संस्‍कृति विभाग के अलग-अलग सेक्‍शन से होती हुई साहित्‍य अकादमी के सचिव के पास पहुँची। बेचारा सचिव उसी वक़्त अपनी गाड़ी में सवार होकर सेक्रेटेरिएट पहुँचा और दबे हुए आदमी से इंटरव्‍यू लेने लगा।

“तुम शायर हो”, उसने पूछा।

“जी हाँ!” दबे हुए आदमी ने जवाब दिया।

“क्‍या तख़ल्‍लुस रखते हो?”

“अवस!”

“अवस!” सचिव ज़ोर से चीख़ा। क्‍या तुम वही हो जिसका मजमुआ-ए-कलाम-ए-अक्‍स के फूल हाल ही में प्रकाशित हुआ है।

दबे हुए शायर ने इस बात पर सिर हिलाया।

“क्‍या तुम हमारी अकादमी के मेम्बर हो?” सचिव ने पूछा।

“नहीं!”

“हैरत है!” सचिव ज़ोर से चीख़ा। “इतना बड़ा शायर! अवस के फूल का लेखक! और हमारी अकादमी का मेम्बर नहीं है! उफ़ उफ़ कैसी ग़लती हो गई हमसे! कितना बड़ा शायर और कैसे गुमनामी के अंधेरे में दबा पड़ा है!”

“गुमनामी के अंधेरे में नहीं बल्कि एक पेड़ के नीचे दबा हुआ… भगवान के लिए मुझे इस पेड़ के नीचे से निकालिए।”

“अभी बंदोबस्‍त करता हूँ।” सचिव फ़ौरन बोला और फ़ौरन जाकर उसने अपने विभाग में रिपोर्ट पेश की।

दूसरे दिन सचिव भागा-भागा शायर के पास आया और बोला, “मुबारक हो, मिठाई खिलाओ, हमारी सरकारी अकादमी ने तुम्‍हें अपनी साहित्‍य समिति का सदस्‍य चुन लिया है। ये लो आर्डर की कॉपी।”

“मगर मुझे इस पेड़ के नीचे से तो निकालो।” दबे हुए आदमी ने कराहकर कहा। उसकी साँस बड़ी मुश्किल से चल रही थी और उसकी आँखों से मालूम होता था कि वह बहुत कष्‍ट में है।

“यह हम नहीं कर सकते।” सचिव ने कहा, “जो हम कर सकते थे वह हमने कर दिया है। बल्कि हम तो यहाँ तक कर सकते हैं कि अगर तुम मर जाओ तो तुम्‍हारी बीवी को पेंशन दिला सकते हैं। अगर तुम आवेदन दो तो हम यह भी कर सकते हैं।”

“मैं अभी ज़िंदा हूँ।” शायर रुक-रुककर बोला, “मुझे ज़िंदा रखो।”

“मुसीबत यह है…” सरकारी अकादमी का सचिव हाथ मलते हुए बोला, “हमारा विभाग सिर्फ संस्‍कृति से ताल्‍लुक़ रखता है। आपके लिए हमने वन विभाग को लिख दिया है। अर्जेंट लिखा है।”

शाम को माली ने आकर दबे हुए आदमी को बताया कि कल वन विभाग के आदमी आकर इस पेड़ को काट देंगे और तुम्‍हारी जान बच जाएगी।

माली बहुत ख़ुश था। हालाँकि दबे हुए आदमी की सेहत जवाब दे रही थी। मगर वह किसी न किसी तरह अपनी ज़िन्दगी के लिए लड़े जा रहा था। कल तक… सुबह तक… किसी न किसी तरह उसे ज़िंदा रहना है।

दूसरे दिन जब वन विभाग के आदमी आरी, कुल्‍हाड़ी लेकर पहुँचे तो उन्‍हें पेड़ काटने से रोक दिया गया। मालूम हुआ कि विदेश मंत्रालय से हुक्‍म आया है कि इस पेड़ को न काटा जाए। वजह यह थी कि इस पेड़ को दस साल पहले पिटोनिया के प्रधानमंत्री ने सेक्रेटेरिएट के लॉन में लगाया था। अब यह पेड़ अगर काटा गया तो इस बात का पूरा अंदेशा था कि पिटोनिया सरकार से हमारे सम्बन्ध हमेशा के लिए बिगड़ जाएँगे।

“मगर एक आदमी की जान का सवाल है!” एक क्‍लर्क ग़ुस्से से चिल्‍लाया।

“दूसरी तरफ़ दो हुकूमतों के ताल्लुक़ात का सवाल है।” दूसरे क्‍लर्क ने पहले क्‍लर्क को समझाया, “और यह भी तो समझ लो कि पिटोनिया सरकार हमारी सरकार को कितनी मदद देती है। क्‍या हम इनकी दोस्‍ती की ख़ातिर एक आदमी की ज़िन्दगी को भी क़ुरबान नहीं कर सकते।”

“शायर को मर जाना चाहिए?”

“बिलकुल!”

अंडर सेक्रेटरी ने सुपरिंटेंडेंट को बताया। आज सुबह प्रधानमंत्री दौरे से वापस आ गए हैं। आज चार बजे विदेश मंत्रालय इस पेड़ की फ़ाइल उनके सामने पेश करेगा। वो जो फ़ैसला देंगे वही सबको मंज़ूर होगा।

शाम चार बजे ख़ुद सुपरिन्‍टेंडेंट शायर की फाइल लेकर उसके पास आया, “सुनते हो?” आते ही ख़ुशी से फ़ाइल लहराते हुए चिल्‍लाया, “प्रधानमंत्री ने पेड़ को काटने का हुक्‍म दे दिया है। और इस मामले की सारी अंतर्राष्‍ट्रीय ज़िम्मेदारी अपने सिर पर ले ली है। कल यह पेड़ काट दिया जाएगा और तुम इस मुसीबत से छुटकारा पा लोगे।”

“सुनते हो आज तुम्‍हारी फ़ाइल मुकम्‍मल हो गई।” सुपरिन्‍टेंडेंट ने शायर के बाज़ू को हिलाकर कहा। मगर शायर का हाथ सर्द था। आँखों की पुतलियाँ बेजान थीं और चींटियों की एक लम्बी क़तार उसके मुँह में जा रही थी।

उसकी ज़िन्दगी की फ़ाइल मुकम्‍मल हो चुकी थी। 

कविता: यह मन्दिर का दीप (लेखक: महादेवी वर्मा)

         यह मन्दिर का दीप महादेवी वर्मा        यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो  रजत शंख घड़ियाल स्वर्ण वंशी-वीणा-स्वर, गये आरती वेला को शत...