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शनिवार, 18 जनवरी 2025

कविता: यह मन्दिर का दीप (लेखक: महादेवी वर्मा)

      

यह मन्दिर का दीप

महादेवी वर्मा







 


    यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो 
रजत शंख घड़ियाल स्वर्ण वंशी-वीणा-स्वर,
गये आरती वेला को शत-शत लय से भर,
जब था कल कंठो का मेला,
विहंसे उपल तिमिर था खेला,
अब मन्दिर में इष्ट अकेला,
इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो!

    चरणों से चिन्हित अलिन्द की भूमि सुनहली,
प्रणत शिरों के अंक लिये चन्दन की दहली,
झर सुमन बिखरे अक्षत सित,
धूप-अर्घ्य नैवेदय अपरिमित 
तम में सब होंगे अन्तर्हित,
सबकी अर्चित कथा इसी लौ में पलने दो! 

    पल के मनके फेर पुजारी विश्व सो गया,
प्रतिध्वनि का इतिहास प्रस्तरों बीच खो गया,
सांसों की समाधि सा जीवन,
मसि-सागर का पंथ गया बन
रुका मुखर कण-कण स्पंदन,
इस ज्वाला में प्राण-रूप फिर से ढलने दो!

    झंझा है दिग्भ्रान्त रात की मूर्छा गहरी
आज पुजारी बने, ज्योति का यह लघु प्रहरी,
जब तक लौटे दिन की हलचल,
तब तक यह जागेगा प्रतिपल,
रेखाओं में भर आभा-जल
दूत सांझ का इसे प्रभाती तक चलने दो!

मंगलवार, 6 अगस्त 2024

कविता: कालिदास (लेखक: नागार्जुन)

    

कालिदास

नागार्जुन



कालिदास, सच-सच बतलाना! 
इंदुमती के मृत्युशोक से 
अज रोया या तुम रोए थे? 
कालिदास, सच-सच बतलाना! 

शिवजी की तीसरी आँख से 
निकली हुई महाज्वाला में 
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम 
कामदेव जब भस्म हो गया 
रति का क्रंदन सुन आँसू से 
तुमने ही तो दृग धोए थे? 

कालिदास, सच-सच बतलाना! 
रति रोई या तुम रोए थे? 
वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका 
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का 
देख गगन में श्याम घन-घटा 
विधुर यक्ष का मन जब उचटा 
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर 
चित्रकूट से सुभग शिखर पर 
उस बेचारे ने भेजा था 
जिनके ही द्वारा संदेशा 
उन पुष्करावर्त मेघों का 
साथी बनकर उड़ने वाले 
कालिदास, सच-सच बतलाना! 
पर पीड़ा से पूर-पूर हो 
थक-थक कर औ' चूर-चूर हो 
अमल-धवलगिरि के शिखरों पर 
प्रियवर, तुम कब तक सोये थे? 
रोया यक्ष कि तुम रोए थे! 
कालिदास, सच-सच बतलाना! 

शुक्रवार, 21 जून 2024

कविता: नक्सलबाड़ी (लेखक: धूमिल)

   

नक्सलबाड़ी 

सुदामा पाण्डेय 'धूमिल'

‘सहमति…
नहीं, यह समकालीन शब्द नहीं है
इसे बालिग़ों के बीच चालू मत करो’

- जंगल से जिरह करने के बाद

उसके साथियों ने उसे समझाया कि भूख
का इलाज नींद के पास है!

मगर इस बात से वह सहमत नहीं था
विरोध के लिए सही शब्द टटोलते हुए
उसने पाया कि वह अपनी ज़ुबान
सहुवाइन की जाँघ पर भूल आया है;
फिर भी हकलाते हुए उसने कहा -
‘मुझे अपनी कविताओं के लिए
दूसरे प्रजातन्त्र की तलाश है’,
सहसा तुम कहोगे और फिर एक दिन -
पेट के इशारे पर
प्रजातन्त्र से बाहर आकर
वाजिब ग़ुस्से के साथ अपने चेहरे से
कूदोगे
और अपने ही घूँसे पर
गिर पड़ोगे।

क्या मैंने ग़लत कहा? आख़िरकार
इस ख़ाली पेट के सिवा
तुम्हारे पास वह कौन-सी सुरक्षित
जगह है, जहाँ खड़े होकर
तुम अपने दाहिने हाथ की
साज़िश के ख़िलाफ़ लड़ोगे?

यह एक खुला हुआ सच है कि आदमी -
दाएँ हाथ की नैतिकता से
इस कदर मजबूर होता है
कि तमाम उम्र गुज़र जाती हैं मगर गाँड
सिर्फ़ बायाँ हाथ धोता है।

और अब तो हवा भी बुझ चुकी है
और सारे इश्तहार उतार लिए गए हैं
जिनमें कल आदमी -
अकाल था। वक़्त के
फालतू हिस्सों में
छोड़ी गयी पालतू कहानियाँ
देश-प्रेम के हिज्जे भूल चुकी हैं,
और वह सड़क -
समझौता बन गयी है
 
जिस पर खड़े होकर
कल तुमने संसद को
बाहर आने के लिए आवाज़ दी थी
नहीं, अब वहाँ कोई नहीं है
मतलब की इबारत से होकर
सब के सब व्यवस्था के पक्ष में
चले गए हैं। लेखपाल की
भाषा के लम्बे सुनसान में
जहाँ पालो और बंजर का फ़र्क़
मिट चुका है चन्द खेत
हथकड़ी पहने खड़े हैं।

और विपक्ष में -
सिर्फ़ कविता है।
सिर्फ़ हज्जाम की खुली हुई ‘किसमत’ में एक उस्तुरा -
चमक रहा है।
सिर्फ़ भंगी का एक झाड़ू हिल रहा है
नागरिकता का हक़ हलाल करती हुई
गन्दगी के ख़िलाफ़।

और तुम हो, विपक्ष में
बेकारी और नींद से परेशान।

और एक जंगल है -
मतदान के बाद ख़ून में अन्धेरा
पछींटता हुआ।
(जंगल मुख़बिर है)
उसकी आँखों में
चमकता हुआ भाईचारा
किसी भी रोज़ तुम्हारे चेहरे की हरियाली को
बेमुरव्वत, चाट सकता है।

ख़बरदार!
उसने तुम्हारे परिवार को
नफ़रत के उस मुक़ाम पर ला खड़ा किया है
कि कल तुम्हारा सबसे छोटा लड़का भी
तुम्हारे पड़ोसी का गला
अचानक,
अपनी स्लेट से काट सकता है।
क्या मैंने ग़लत कहा?
आख़िरकार… आख़िरकार…

कविता: यह मन्दिर का दीप (लेखक: महादेवी वर्मा)

         यह मन्दिर का दीप महादेवी वर्मा        यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो  रजत शंख घड़ियाल स्वर्ण वंशी-वीणा-स्वर, गये आरती वेला को शत...