बुधवार, 22 मई 2024

कहानी: टोबा टेकसिंह (लेखक: सआदत हसन मंटो)

  

टोबा टेकसिंह

सआदत हसन मंटो


बँटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाए और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाए। 
मालूम नहीं यह बात ठीक थी या नहीं। बहरहाल बुद्धिमानों के फैसले के अनुसार इधर-उधर ऊंचे स्तर की कांफ्रेंसें हुई और आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए नियत हो गया। अच्छी तरह छानबीन की गयी। वे मुसलमान पागल जिनके अभिभावक हिन्दुस्तान में थे, वहीं रहने दिये गये थे। और जो बाकी थे उन्हें सीमा पार रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान से, क्यूंकि करीब-करीब सब हिन्दु-सिख जा चुके थे, इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस के संरक्षण में सीमा पर पहुंचा दिये गये। उधर की मालूम नहीं, लेकिन इधर लाहौर के पागलखानों में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प और कौतुकपूर्ण बातें होने लगीं। एक मुसलमान पागल, जो बारह बरस से रोज़ाना बाकायदगी के साथ 'जमींदार' पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा -

-- मौलवी साहब। ये पाकिस्तान क्या होता है ?

तो उसने बड़े सोच विचार  के बाद जवाब दिया -

-- हिन्दुस्तान में एक ऐसी जगह है, जहां उस्तरे बनते हैं।

ये जवाब सुनकर उसका मित्र संतुष्ट हो गया।

इसी तरह एक एक दिन एक सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा--

-- सरदार जी, हमें हिन्दुस्तान क्यों भेजा जा रहा है ? हमें तो वहां की बोली नहीं आती।

दूसरा मुस्करा दिया -

-- मुझे तो हिन्दुस्तान की बोली आती है - हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ -आकड़ फिरते हैं।

एक मुसलमान पागल ने नहाते-नहाते 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' का नारा इस बुलंदी से लगाया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और अचेत हो गया। कुछ पागल ऐसे भी थे, जो पागल नहीं थे। इनमें अधिकतर ऐसे कातिल थे, जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे-दिलाकर पागलखाने भिजवा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जायें। ये कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान का क्यों विभाजन हुआ है, और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सभी घटनाओं से ये भी बेखबर थे। अखबारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़, जाहिल थे। सिर्फ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्ना है, जिसको कायदे-आज़म कहते हैं। उसने मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क बनाया है, जिसका नाम पाकिस्तान है। यह कहां है ? इसकी स्थिति क्या है ? इसके विषय में वह कुछ नहीं जानते थे। यही कारण है कि पागलखाने में वो सब पागल, जिनका दिमाग पूरी से ख़राब नहीं था, इस उहापोह में थे कि वो पाकिस्तान में हैं या हिन्दुस्तान में। अगर हिन्दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है, और अगर वो पाकिस्तान में है तो ये कैसे हो सकता है कि वो कुछ अरसा पहले यहां रहते हुए भी हिन्दुस्तान में थे। एक पागल तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान, और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा पड़ा कि और ज्यादा पागल हो गया। झाड़ू देते-देते एक दिन दरख्त पर चढ़ गया और टहनी पर बैठ कर दो घंटे लगातार भाषण देता रहा, जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के नाजुक मामले पर था। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वो और ऊपर चढ़ गया। डराया-धमकाया गया तो उसने कहा-

--  न मैं हिन्दुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में, मैं इस पेड़ पर ही रहूंगा।

बड़ी मुश्किलों के बाद जब उसका दौरा ठंडा पड़ गया, तो वह नीचे उतरा और अपने हिन्दू-सिख दोस्तों के गले मिल-मिलकर रोने लगा। इस ख्याल से उसका दिल भर आया की वे उसे छोड़कर हिंदुस्तान चले जायेंगे। 

एक एम. एस-सी. पास रेडियो इंजीनियर, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग-थलग, बाग की एक खास रोश (क्यारी) पर सारा दिन खामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली प्रकट हुई कि उसने तमाम कपड़े उतारकर दफेदार के हवाले कर दिये और नंग-धंडंग़ सारे बाग में चलना शुरू कर दिया।

चिन्योट के एक मौटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का एक सक्रिय कार्यकर्ता रह चुका था और दिन में पन्द्रह-सोलह बार नहाया करता था, एकदम यह आदत छोड़ दी। उसका नाम मुहम्मद अली था। चुनांचे उसने एक दिन अपने जंगले में घोषणा कर दी कि वह कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना है। उसकी देखा-देखी एक सिख पागल मास्टर तारासिंह बन गया। करीब था कि उस जंगले में खून-खराबा हो जाए, मगर दोनों को खतरनाक पागल करार देकर अलग-अलग बन्द कर दिया गया।

लाहौर का एक नौजवान हिन्दू वकील था, जो मुहब्बत में पड़कर पागल हो गया था। जब उसने सुना कि अमृतसर हिन्दुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुःख हुआ। उसी शहर की एक हिन्दू लड़की से उसे प्रेम हो गया था। यद्यपि उसने इस वकील को ठुकरा दिया था, मगर दीवानगी की हालत में भी वह उसको भूला नहीं था। चुनांचे वह उन तमाम मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था, जिन्होंने मिल-मिलाकर हिन्दुस्तान के दो टुकड़े कर दिये। उसकी प्रेमिका हिन्दुस्तानी बन गयी और वह पाकिस्तानी।

जब तबादले की बात शुरू हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल छोटा न करे, उसको हिन्दुस्तान भेज दिया जायेगा-- उस हिन्दुस्तान में, जहां उसकी प्रेमिका रहती है, मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था। इस ख्याल से कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी। यूरोपियन वार्ड में दो एंग्लो-इण्डियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान को आजाद करके अंग्रेज चले गये हैं तो उनको बड़ा दुःख हुआ। वे छिप-छिपकर घण्टों इस समस्या पर बातचीत करते रहते कि पागलखने में उनकी हैसियत क्या होगी-- यूरापियन वार्ड रहेगा या जाएगा। ब्रेकफास्ट मिला करेगा या नहीं। क्या उन्हें डबल रोटी के बजाय ब्लडी इण्डियन चपाती तो ज़हर-मार  नहीं करनी पड़ेगी ?

एक सिख था, जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पन्द्रह वर्ष हो चुके थे। हर समय उसकी ज़बान से अजीबोगरीब शब्द सुनने में आते थे, "ओपड़ दी गड़-गड़ दी अनैक्स दी बेध्यानां दी मुंग दी दाल ऑफ़ दी लालटेन।" वो न दिन में सोता था न रात में। पहरेदारों का कहना था कि पन्द्रह वर्ष के इस लम्बे अर्से में एक एक क्षण के लिए भी नहीं सोया। लेटता भी नहीं था। अलबत्ता कभी-कभी किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।

हर समय खड़ा रहने से उसके पांव सूज गये थे। पिंडलियां भी फूल गयीं थीं, मगर इस शारीरिक तकलीफ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के विषय में जब कभी पागलखाने में चर्चाहोती थी तो वह ध्यान से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या खयाल है तो बड़ी गंभीरता से जवाब देता, "ओपड़ दी गड़-गड़ दी अनैक्स दी बेध्यानां दी मुंग दी दाल ऑफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।"

लेकिन बाद में 'ऑफ़ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट' की जगह 'ऑफ़ दी टोबा टेकसिंह गवर्नमेंट' ने ले ली और दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है, जहां का वो रहने वाला है। लेकिन किसी को भी नहीं मालूम था कि वो पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में। जो बताने की कोशिश करते थे, वो खुद इस उलझन में फंस जाते थे कि स्यालकोट पहले हिन्दुस्तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है, कल हिन्दुस्तान में चला जायगा या सारा हिन्दुस्तान ही पाकिस्तान बन जायेगा और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब न हो जायेंगे।

उस सिख पागल के केश छिदरे होकर बहुत थोड़े ही रह गए थे। चूंकि वह बहुत कम नहाता था, दाढ़ी और बाल आपस में जम गये थे, जिसके कारण उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गयी थी। लेकिन वह आदमी किसी का नुक्सान नहीं करता था। पन्द्रह वर्षों में उसने किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था। पागलखाने के जो पुराने नौकर थे वो उसके बारे में इतना जानते थे कि टोबा टेकसिंह में उसकी कई जमीनें थीं। अच्छा खाता-पीता जमींदार था कि अचानक दिमाग उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों में उसे बांधकर लाये और पागलखाने में दाखिल करा गये।

महीने में एक बार मुलाकात के लिए ये लोग आते थे और उसकी राज़ी-ख़ुशी मालूम करके चले जाते थे। मुद्दत तक ये क्रम चलता रहा, पर जब पाकिस्तान-हिन्दुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना बन्द हो गया।

उसका नाम बिशन सिंह था, मगर सब उसे टोबा टेकसिंह कहते थे। उसको ये मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है, महीना कौन-सा है या कितने साल बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उसके स्वजन और सम्बन्धी उससे मिलने आते तो उसे अपने-आप पता चल जाता था। चुनांचे वो दफादार से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर खूब साबुन घिसता और सिर में तेल लगाकर कंघा करता। अपने कपड़े, जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवाकर पहनता और यूं सज-बनकर मिलने वालों के पास जाता। वो उससे कुछ पूछते तो वह चुप रहता या कभी-कभी "ओपड़ दी गड़-गड़ दी अनैक्स दी बेध्यानां दी मुंग दी दाल ऑफ़ दी लालटेन।" कह देता।

उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक अंगुल बढ़ती-बढ़ती पन्द्रह वर्ष में जवान हो गयी थी। बिशन सिंह उसको पहचानता ही न था। जब वह बच्ची थी, तब भी आपने बाप को देखकर रोती थी जवान हुई तब भी उसकी आंख में आंसू बहते थे।

पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है। जब सन्तोषजनक उत्तर न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब-दिन बढ़ती गयी। अब मुलाकात भी नहीं आती है। पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज भी बन्द हो गयी थी जो उसे उनके आने की खबर दे दिया करती थी।

उसकी बड़ी इच्छा थी कि वे लोग आयें, जो उससे सहानुभूति प्रकट करते थे ओर उसके लिए फल, मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वह यदि उनसे पूछता कि टोबा टेकसिंह कहां है तो वे निश्चित बता देते कि पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में, क्योंकि उसका विचार था कि वो टोबा टेकसिंह ही से आते हैं, जहां उसकी जमीनें हैं।

पागलखाने में एक पागल ऐसा भी था जो अपने को खुदा कहता था। उससे जब एक दिन बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में, तो उसने अपनी आदत के अनुसार कहकहा लगाया और कहा--

-- वो न पाकिस्तान में है न हिन्दुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म नहीं दिया।

बिशन सिंह ने उस खुदा से कई बार मिन्नत-खुशामद से कहा कि वो हुक्म दे दे ताकि झंझट खत्म हो, मगर वो बहुत व्यस्त था, इसलिए कि उसे और भी अनगिनत हुक्म देने थे। एक दिन तंग आकर वह उस पर बरस पड़ा, "ओपड़ दी गड़-गड़ दी अनैक्स दी बेध्यानां दी मुंग दी दाल ऑफ़ वाहे गुरूजी दा खलसा एंड वाहे गुरू जी दी फतह - जो बोले सो निहाल - सत श्री अकाल।"

उसका शायद यह मतलब था कि तुम मुसलमानों के खुदा हो - सिखों के खुदा होते तो जरूर मेरी सुनते।

तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेकसिंह का एक मुसलमान, जो उसका दोस्त था मुलाकात के लिए आया। पहले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ हटा और वापस जाने लगा। मगर सिपाहियों ने उसे रोका, "ये तुमसे मिलने आया है - तुम्हारा दोस्त फज़लुद्दीन है।"

बिशन सिंह ने फज़लुद्दीन को एक नज़र देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फज़लुद्दीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा।

-- मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं लेकिन फुर्सत ही न मिली। तुम्हारे सब आदमी राज़ी-ख़ुशी हिन्दुस्तान चले गए थे मुझसे जितनी मदद हो सकी मैंने की। तुम्हारी बेटी रूप कौर...।

वह कुछ कहते कहते रुक गया। बिशन सिंह कुछ याद करने लगा -- "बेटी रूप कौर ?"

फज़लुद्दीन ने कुछ रूककर कहा-

-- हां... वह... वह भी ठीक ठाक है। उनके साथ ही चली गयी थी।

बिशन सिंह चुप रहा। फज़लुद्दीन ने कहना शुरू किया --

-- उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी राज़ी-ख़ुशी पूछता रहूँ। अब मैंने सुना है तुम हिन्दुस्तान जा रहे हो। भाई बलबीर सिंह और भाई बिधावा सिंह से मेरा सलाम कहना और बहन अमृत कौर से भी। भाई बलबीर से कहना -- फज़लुद्दीन राज़ी-ख़ुशी है। वो भूरी भैंसे, जो वो छोड़ गये थे, उनमें से एक ने कट्टा दिया है, दूसरी के कट्टी हुई थी, पर वो छ: दिन की होकर मर गयी... और मेरे लायक जो खिदमत हो कहना। मैं हर वक्त तैयार हूं... और ये तुम्हारे लिए थोड़े से मरूण्डे लाया हूं।

बिशन सिंह ने मरूण्डों की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फज़लुद्दीन से पूछा, "टोबा टेकसिंह कहां है ?"

"टोबा टेकसिंह..." उसने तनिक आश्चर्य से कहा -- "कहां है ? वहीं है, जहां था।"

बिशन सिंह ने पूछा -- "पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में ?"

-- "हिन्दुस्तान में...। नहीं-नहीं पाकिस्तान में...।" फज़लुद्दीन बौखला-सा गया।

बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया -- "ओपड़ दी गड़-गड़ दी अनैक्स दी बेध्यानां दी मुंग दी दाल ऑफ़ दी पाकिस्तान एंड हिन्दुस्तान ऑफ़ दी दूर फिट्टे मुँह।"

तबादले की तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। इधर-से-उधर और उधर-से-इधर आने वाले पागलों की सूचियाँ पहुँच गयी थीं और  तबादले का दिन भी निश्चित हो चुका था। सख्त सर्दियां थीं। लाहौर के पागलखाने से हिन्दू-सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के दस्ते के साथ रवाना हुईं। संबंधित अफसर भी उनके साथ थे। बाघा के बार्डर पर दोनों ओर के सुपरिंडेंटेंट एक-दूसरे से मिले और प्रारम्भिक कार्रवाई खत्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया, जो रात-भर जारी रहा।

पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफसरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। कुछ तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने को तैयार होते थे, उनको संभालना मुश्किल होता क्योंकि इधर-उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे, उनको कपड़े पहनाये जाते, तो वो फाड़कर अपने शरीर से अलग कर देतेकोई गालियां बक रहा है तो कोई गा रहा है। आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, रो रहे हैं, बक रहे हैं। कान पड़ी आवाज सुनायी नही देती थी। पागल स्त्रियों का शोरगुल अलग था और सर्दी इतने कड़ाके की थी कि दांत से दांत बज रहे थे।

अधिकतर पागल इस तबादले को नहीं चाहते थे। इसलिए कि उनकी समझ में आता था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है। थोड़े-से वे जो कुछ सोच-समझ सकते थे, 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' के नारे लगा रहे थे। दो-तीन बार झगड़ा होते-होते बचा, क्योंकि कुछ हिन्दुस्तानियों और सिखों को ये नारे सुनकर तैश आ था।

जब बिशन सिंह की बारी आयी और जब उसको दूसरी और भेजने के सम्बन्ध में अधिकारी-लिखत पढ़त करने लगा तो उसने पूछा -- "टोबा टेकसिंह कहां है ? पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में ?"
सम्बंधित अधिकारी हँसा और बोला -- "पाकिस्तान में।"

यह सुनकर विशनसिंह उछलकर एक तरफ हटा और दौड़कर अपने बाकी साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे, किन्तु उसने चलने से इन्कार कर दिया, और जोर-जोर से चिल्लाने लगा -- "टोबा टेकसिंह कहां है ? ओपड़ दी गड़-गड़ दी अनैक्स दी बेध्यानां दी मुंग दी दाल ऑफ़ दी टोबा टेकसिंह एंड पाकिस्तान।

उसे बहुत समझाया गया कि देखों अब टोबा टेकसिंह हिन्दुस्तान में चला गया है -- यदि नहीं गया है तो उसे तुरंत ही वहाँ भेज दिया जायगा। किन्तु वह न माना। जब उसको जबरदस्ती दूसरी ओर ले जाने की कोशिश की गयी तो वह बीच में एक स्थान पर इस प्रकार अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया, जैसे अब उसे कोई ताकत वहाँ से नहीं हटा सकेगी। क्योंकि आदमी बेज़रर था, इसलिए उसके साथ ज़बरदस्ती नहीं की गयी। उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और शेष काम होता रहा।

सूरज निकलने से पहले स्तब्ध खड़े हुए बिशनसिंह हलक से एक गगनभेदी चीख निकली। इधर-उधर से कई अफसर दौड़ आये और देखा कि वो आदमी जो पन्द्रह वर्ष तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा, औंधे मुंह लेटा था। इधर कांटेदार तारों के पीछे हिन्दुस्तान था -- उधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान।

बीच में ज़मीन के उस टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेकसिंह पड़ा था। 

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