शनिवार, 8 जून 2024

कहानी: तमाशा (लेखक: सआदत हसन मंटो)

 

तमाशा

सआदत हसन मंटो


दो-तीन रोज़ से हवाई जहाज सियाह उकाबों की तरह पर फैलाए खामोश फ़िज़ा में मंडरा रहे थे, जैसे वे किसी शिकार की तलाश में हों, सुर्ख आँधियाँ वक्त-बेवक्त किसी आने वाले खूनी हादसे का पैगाम ला रही थीं, सुनसान बाजारों में सशस्त्र पुलिस की गश्त एक अजीब भयावह समा पेश कर रही थी, वे बाजार, जो आज से कुछ अरसे पहले लोगों के हुजूम से भरे हुआ करते थे, अब किसी नामालूम खौफ की वजह से सूने पड़े थे-शहर की फिजा पर एक रहस्यमयी खामोशी छायी हुई थी और भयानक खौफ राज कर रहा था ।

खालिद घर की खामोश और स्तब्ध फिजा से सहमा हुआ अपने वालिद के करीब बैठा बातें कर रहा था, "अब्बा, आप मुझे स्कूल क्यों नहीं जाने देते ?"

"बेटा, आज, स्कूल में छुट्टी है।"

"मास्टर साहब ने तो हमें बताया ही नहीं, वह तो कल कह रहे थे कि जो लड़का आज स्कूल का काम खत्म करके अपनी कापी नहीं दिखलाएगा, उसे सख्त सजा दी जाएगी।"

"वह बतलाना भूल गए होंगे।" "आपके दफतर में छुट्टी होगी ?"

"हाँ, हमारा दफ्तर भी आज बंद है।"

"चलो अच्छा हुआ, आज आपसे कोई अच्छी-सी कहानी सुनूंगा ।"

यह बातें हो रही थीं कि तीन-चार जहाज चीखते हुए उनके सिर पर से गुजर गए। खालिद उनको देखकर बहुत भयभीत हो गया। वह तीन-चार रोज से इन जहाजों को गौर से देख रहा था, मगर किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सका। वह हैरान था कि ये जहाज सारा दिन धूप में क्यों चक्कर लगाते रहते हैं। वह उनकी रोजाना की गतिविधि से सख्त तंग आकर बोला, "अब्बा, मुझे इन जहाजों से सख्त खौफ मालूम हो रहा है। आप इनके चलाने वालों से पहले कह दें कि वे हमारे घर से न गुजरा करें।"

"खौफ? कहीं पागल तो नहीं हो गए खालिद !"

"अब्बा, ये जहाज बहुत खौफनाक हैं। आप नहीं जानते ये किसी न किसी दिन हमारे घर पर गोला फेंक देंगे। कल सुबह मामा अम्मीजान से कह रही थीं कि इन जहाज वालों के पास बहुत-से गोले हैं। अब्बा, अगर उन्होंने इस किस्म की कोई शरारत की तो याद रखें, मेरे पास भी एक बन्दूक है, वही जो आपने मुझे पिछली ईद पर लाकर दी थी।"

खालिद के अब्बा ने अपने लड़के के गैरमामूली साहस पर हँसते हुए कहा, "मामा तो पागल हैं, मैं उनसे दरयाफ्त करूंगा कि वह घर में ऐसी बात क्यों करती हैं। इत्मीनान रखो, वे ऐसी बात कभी नहीं करेंगी।"

अपने वालिद से रुख्सत होकर खालिद अपने कमरे में चला गया और हवाई बन्दूक निकालकर निशाने लगाने का अभ्यास करने लगा ताकि उस रोज, हवाई जहाज वाले गोले फेंकें, तो उसका निशाना न चूक जाए और वह पूरी तरह बदला ले सके। काश! प्रतिशोध का वही नन्हा जज़्बा हर शख्स में पैदा हो जाए।

इसी अर्से में जबकि एक नन्हा बच्चा अपनी बदला लेने की फिक्र में डूबा हुआ तरह-तरह से मनसूबे बाँध रहा था, घर के दूसरे हिस्से में खालिद का अब्बा अपनी बीवी के पास बैठा हुआ मामा को हिदायत कर रहा था कि वह आगे से घर में इस किस्म की कोई बात न करें जिससे खालिद को दहशत हो। मामा को और बीवी को इस किस्म की ताकीद करके वह अभी बड़े दरवाजे से बाहर जा रहा था कि खादिम एक भयानक खबर लाया कि शहर के लोग बादशाह के मना करने पर भी शाम के करीब एक आम जलसा करने वाले हैं। और यह आशा की जाती है कि कोई न कोई दुर्घटना जरूर पेश आकर रहेगी।

खालिद का अब्बा यह खबर सुनकर बहुत खौफज़दा हुआ। अब उसे यकीन हो गया कि माहौल का गैरमामूली सुकून, जहाजों की उड़ान, बाजारों में सशस्त्र पुलिस की गश्त, लोगों के चेहरों पर उदासी का आलम और खूनी आँधियों की आमद किसी खौफनाक हादसे के आसार थे। वह हादसा किस किस्म का होगा यह खालिद के अब्बा की तरह किसी को भी मालूम नहीं था। मगर फिर भी सारा शहर किसी नामालूम खौफ से लिपटा हुआ था। बाजार जाने के ख्याल को तर्क करके खालिद का अब्बा अभी कपड़े भी नहीं बदल पाया था कि जहाजों का शोर बुलन्द हुआ। वह सहम गया। उसे लगा, जैसे सैकड़ों इंसान एक-सी आवाज में दर्द की शिद्दत से कराह रहे हैं। खालिद जहाजों का शोरगुल सुनकर अपनी हवाई बंदूक सँभालता हुआ कमरे से बाहर दौड़ आया और उन्हें गौर से देखने लगा, ताकि वे जिस वक्त गोला फेंकने लगें, तो वह अपनी हवाई बन्दूक की मदद से उन्हें नीचे गिरा दे। इस वक्त इस छह साला बच्चे के चेहरे पर मजबूत इरादा और दृढ़ निश्चय के लक्षण प्रकट थे जो कम हकीकत बन्दूक का खिलौना हाथ में थामे एक वीर सिपाही को शर्मिन्दा कर रहा था। मालूम होता था कि वह आज इस चीज को, जो उसे अरसे से खौफजदा कर रही थी, मिटाने पर तुला हुआ है। खालिद के देखते-देखते एक जहाज से कुछ चीज गिरी, जो कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों के समान थी- गिरते ही वे टुकड़े हवा में पतंगों की तरह उड़ने लगे। इनमें से चन्द खालिद के मकान की छत पर भी गिरे। खालिद भागता हुआ ऊपर गया और कागज उठाकर अपने वालिद के पास ले गया।

"अब्बाजी! मामा सचमुच झूठ बक रही थी, जहाज वालों ने तो गोलों को बजाय ये कागज फेंके हैं।"

खालिद के बाप ने वह कागज लेकर पढ़ना शुरू किया तो रंग ज़र्द हो गया - होने वाले हादसे की तस्वीर अब उसे साफ तौर पर नजर आने लगी। उस इश्तहार में साफ़ लिखा था कि बादशाह किसी को जलसा करने की इजाज़त नहीं देता और अगर उसकी मर्ज़ी के खिलाफ कोई जलसा किया गया तो अंजाम की जिम्मेदार स्वयं जनता होगी। अपने वालिद को इश्तहार पढ़ने के बाद इस कदर हैरान देखकर खालिद ने घबराते हुए पूछा, "इस कागज में यह तो नहीं लिखा कि वे हमारे घर पर गोले फेंकेंगे?"

"खालिद, इस वक्त तुम जाओ... जाओ, अपनी बन्दूक के साथ खेलो।"

 "मगर इसमें लिखा क्या है?"

"लिखा है, आज शाम को एक तमाशा होगा।"

खालिद के बाप ने गुफ्तगू को अधिक बढ़ाने के डर से झूठ बोलते हुए कहा, "तमाशा होगा।"

"फिर तो हम भी चलेंगे न?"

"क्या कहा?"

"क्या इस तमाशे में आप मुझे नहीं ले चलेंगे?"

"ले चलेंगे, अब जाओ, जाकर खेलो।"

"कहाँ खेलूं? बाजार में आप मुझे जाने नहीं देते। मामा मुझसे खेलती नहीं। मेरा सहपाठी भी तो आजकल यहाँ नहीं आता। अब आप ही बताएँ, मैं खेलूं तो किससे खेलूं! शाम के वक्त तमाशा देखने तो जरूर चलेंगे न?" किसी जवाब का इन्तजार किए बगैर खालिद कमरे से बाहर चला गया और अलग-अलग कमरों में आवारा फिरता हुआ अपने वालिद की बैठक में पहुँचा जिसकी खिड़कियाँ बाजार की तरफ खुलती थीं। खिड़की के करीब जाकर वह बाजार की तरफ देखने लगा तो क्या देखता कि बाजार में दुकानें बन्द है, मगर आना-जाना जारी है। लोग जलसे में शामिल होने के लिए जा रहे थे। वह सख्त हैरान था कि दुकानें क्यों बन्द रहती हैं। इस मसले के हल के लिए उसने अपने नन्हे दिमाग पर बहुत जोर दिया, मगर कोई नतीजा न निकाल सका । बहुत सोच-विचार के बाद उसने सोचा कि लोगों ने वह तमाशा देखने की खातिर, जिसके इश्तहार जहाज बाँट रहे थे, दुकानें बन्द कर रखी हैं। अब उसने खयाल किया कि वह कोई निहायत ही दिलचस्प तमाशा होगा, जिसके लिए तमाम बाजार बन्द हैं। इस ख्याल ने खालिद को सख्त बेचैन कर दिया और वह उस वक्त का बेकरारी से इन्तजार करने लगा जब अब्बा उसे तमाशा दिखाने ले चलेंगे ।

वक्त गुजरता गया... वह खूनी घड़ी करीबतर आती गयी।

तीसरे पहर का वक्त था। खालिद, उसका बाप और माँ सहन में चुप बैठे एक-दूसरे की तरफ खामोश निगाहों से ताक रहे थे। हवा सिसकियां भरती हुई चल रही थी। तड़-तड़ की आवाज़ सुनते ही खालिद के बाप के चेहरे का रंग कागज़ की तरह सफ़ेद हो गया। जबान से मुश्किल से इतना ही कह सका, "गोली!"

खालिद की माँ भयातिरेक से एक शब्द भी मुँह से न निकाल सकी। गोली का नाम सुनते ही ऐसा मालूम हुआ जैसे उसकी छाती में गोली उतर रही है। खालिद इस आवाज को सुनते ही अपनी वालिद की अँगुली पकड़कर कहने लगा, "अब्बा जी, चलो चलें! तमाशा तो शुरू हो गया है।"

"कौन-सा तमाशा ?" खालिद के बाप ने अपने खौफ को छुपाते हुए कहा।

"वही तमाशा, जिसके इश्तहार आज सुबह हजाज बाँट रहे थे... खेल शुरू हो गया है, तभी तो इतने पटाखों की आवाज सुनाई दे रही है।"

"अभी बहुत वक्त बाकी है। तुम शोर मत करो - अब जाओ, मामा के पास जाकर खेलो।" खालिद यह सुनते ही बावर्चीखाने की तरफ रवाना हो गया मगर वहाँ मामा को न पाकर अपने वालिद की बैठक में जाकर खिड़की से बाजार की तरफ देखने लगा। बाजार आमदोरफ्त बन्द हो जाने की वजह से साँय-साँय कर रहा था। दूर फासले से कुत्तों की दर्दनाक चीखें सुनाई दे रही थीं। कुछ क्षणों के बाद इन चीखों में इंसानों की दर्दनाक आवाजें शामिल हो गयीं। खालिद किसी को कराहते सुनकर बहुत हैरान हुआ। अभी वह इस आवाज की जुस्तजू के लिए कोशिश कर ही रहा था कि चौक में उसे एक लड़का दिखायी दिया जो चीखता-चिल्लाता भागता चला आ रहा था। खालिद के कमरे के ठीक सामने वह लड़का लड़खड़ाकर गिरा और गिरते ही बेहोश हो गया। उसकी पिंडली पर गहरा ज़ख्म था जिससे फव्वारों खून निकल रहा था। यह दृश्य देखकर खालिद बहुत खौफजदा हुआ। भागकर अपने वालिद के पास आया और कहने लगा, "अब्बा! अब्बा! बाजार में एक लड़का गिरा पड़ा है। उसकी टाँग से बहुत खून निकल रहा है।"

खालिद का बाप यह सुनते ही खिड़की की तरफ गया और देखा कि वाकई एक नौजवान बाजार में औंधे मुंह पड़ा है। बादशाह के खौफ के कारण किसी में इतना साहस नहीं था कि उस लड़के को सड़क पर से उठाकर सामने वाली दुकान के पट्टे पर लिटा दे।

"अब्बा, इस लड़के को किसी ने पीटा है ?"
खालिद का बाप हाँ में सिर हिलाता कमरे के बाहर चला गया।

अब खालिद कमरे में अकेला रह गया। वह सोचने लगा कि इस लड़के को इतने बड़े जख्म से कितनी तकलीफ हुई होगी, जबकि एक दफा उसे चाकू चुभने से ही तमाम रात नींद नहीं आयी थी। उसका बाप और उसकी माँ तमाम रात उसके सिरहाने बैठे रहे थे। इस ख्याल के आते ही उसे ऐसा मालूम होने लगा कि जैसे वह जख्म खुद उसकी पिडली में है और उसमें बहुत तेज दर्द है। यह एकदम रोने लगा।

खालिद के रोने की आवाज सुनकर, उसकी माँ दौड़ती-दौड़ती आयी और उसको गोद में लेकर पूछने लगी, "मेरे बच्चे रो क्यों रहे हो?"

"अम्मी, उसे किसी ने मारा है।"

"शरारत की होगी उसने।"

"मगर स्कूल में तो छड़ी से सज़ा देते हैं। लहू तो नहीं निकालते।"

"छड़ी जोर से लग गयी होगी।"

"तो फिर क्यों इस लड़के को इस कदर मारा है। एक रोज जब मास्टर साहब ने मेरे कान खींचकर सुर्ख कर दिए तो अब्बा जी ने हैडमास्टर के पास शिकायत की थी न!" 

"इस लड़के का मास्टर बहुत बड़ा आदमी है।"

"अल्लाह मियाँ से भी बड़ा?"

"नहीं, उनसे छोटा है।"

"तो, फिर वह अल्लाह मियाँ के पास शिकायत करेगा?"

"अब देर हो गयी है, चलो सोएँ।"

"अल्लाह मियाँ, मैं दुआ करता हूँ कि तू उस मास्टर को जिसने इस लड़के को पीटा है, अच्छी तरह सजा दे और उस छड़ी को छीन ले जिसके इस्तेमाल से खून निकल आता है.. मैंने पहाड़े याद नहीं किए इसलिए मुझे डर है कि कहीं वही छड़ी मेरे उस्ताद के हाथ न आ जाए। अगर तुमने मेरी बात न मानी तो फिर मैं भी तुमसे नहीं बोलूंगा !" सोते वक्त खालिद दिल में दुआ माँग रहा था।

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