मंगलवार, 6 अगस्त 2024

कविता: कालिदास (लेखक: नागार्जुन)

    

कालिदास

नागार्जुन



कालिदास, सच-सच बतलाना! 
इंदुमती के मृत्युशोक से 
अज रोया या तुम रोए थे? 
कालिदास, सच-सच बतलाना! 

शिवजी की तीसरी आँख से 
निकली हुई महाज्वाला में 
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम 
कामदेव जब भस्म हो गया 
रति का क्रंदन सुन आँसू से 
तुमने ही तो दृग धोए थे? 

कालिदास, सच-सच बतलाना! 
रति रोई या तुम रोए थे? 
वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका 
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का 
देख गगन में श्याम घन-घटा 
विधुर यक्ष का मन जब उचटा 
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर 
चित्रकूट से सुभग शिखर पर 
उस बेचारे ने भेजा था 
जिनके ही द्वारा संदेशा 
उन पुष्करावर्त मेघों का 
साथी बनकर उड़ने वाले 
कालिदास, सच-सच बतलाना! 
पर पीड़ा से पूर-पूर हो 
थक-थक कर औ' चूर-चूर हो 
अमल-धवलगिरि के शिखरों पर 
प्रियवर, तुम कब तक सोये थे? 
रोया यक्ष कि तुम रोए थे! 
कालिदास, सच-सच बतलाना! 

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